![]() |
हमें राष्ट्रवादी की परिभाषा अच्छी लगती है। हमें राष्ट्रवाद के ख़िलाफ़ बोलने वाले से सख़्त नफ़रत है। हमें राष्ट्र में अमन और चैन की तस्वीरें अच्छी लगती है। हमारे सपनों में, उम्मीदों में, विश्वासों में व राजनीतिक विचारधाराओं में वे तमाम अवधारणायें हैं जिससे राष्ट्र को सबसे अधिक प्राथमिकता देने के लिए हम खुद को सक्षम मानते है। हम हर वह काम करते हैं जिसमें हम अपने आस पास की एकजुटता, इस देश की परम्परा, संस्कृृति और सभ्यता को मज़बूती मिलती है। हम भारतीय है। हम भारतीयता जानते है। हम भारतीय नागरिकों को समझते है। उनकी स्थिति से परिचित है। हम खुद को उसी राष्ट्रवाद के समीप देखते है जो अट्ठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के युरोप में हुआ था।
आज हम कई देशों की सीमाओं को दूर से देखते है, समीप से समझते है और जब अपने देश को देखते है तो राज्यों की भी सीमाएं नज़र आती है। इन सीमाओं से मुझे बेहद लगाव है क्योंकि इनकी अपनी विचारधारा है और साथ ही विचारधारा का भी किनारा है। शायद किनारे की एहमियत एक केवट से पूछी जाएं तो यह समझना हमारे लिए बेहद दिलचस्प होगा। मगर आज मैं इसी किनारे को कुछ इस तरह देख रहा हूँ कि यह पूरी नदी में खुद की जगह लेने में उतारु हो चला है। मुझे डर है कि कही नदी की ख़ूबसूरती कही गुमनाम न हो जाएं और जब नदी ही न रहे तो उस केवट का क्या होगा ? दरअसल यह आज़ का झकझोर देने वाला सवाल है।
बात राष्ट्रवाद की
हम जिस देश के वासी है, हमारी अपनी जाति है, धर्म है।
इस जाति और धर्म में अपनी सीमा है।
हम मानते है, हम नही भी मानते हैं क्योंकि इस जाति और धर्म में विश्वास अधूरा है।
हम जिस देश के वासी है, उस देश में हिंसा के कई गुट हैं। जो अपनी मर्ज़ी के अनुसार किसी का कत्ल और इंसानियत को शर्मसार करते है और उसे देश में खुद को राष्ट्रवाद कहने वाले हिंसा को सपोर्ट करते है। राष्ट्रवाद का ठेका परोसा जाता है। इस देश के राष्ट्रवादी को डर होता है कही मेरा ठेका छिन न जाएं इसीलिए राष्ट्रवादी के नाते हिंसा फ़ैलाने वाले गुट को सपोर्ट करता है।
हम जिस देश के वासी है, उस देश के नोटों पर गांधी है क्योंकि सत्य और अहिंसा के हम पुजारी है।
हम मंदिर, मस्ज़िद, गुरुद्वारा और चर्च जाते है क्योंकि वक्त बदलता है ईद आती है, शाम होती है दीवाली आती है, कभी गुरुपर्व आता है तो क्रिसमस आता है। इस देश में कई ख़ुशियों के रंग है क्योंकि दो-ढाई सौ साल पुराने राष्ट्रवाद के संग-संग है।
शर्म आती है आज के राज नेताओं पर, देश के स्तंभ का नाम किनारे लिए उन राज योद्धाओं पर जिसने खुद की राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रवाद की गरीमा को स्थापित करने के बजाय उसे चुनौतियों से ललकारा है। भारत की भूमि को हमने कभी कांग्रेस कहा तो कभी भाजपा लेकिन इन सब के बीच हमारे दिलों दिमाग से लेकर भारतीय भूमि पर तिरंगा लहराता दिखा। जिसकी अपनी पहचान है, राष्ट्रीय ध्वज की पट्टी में केसरिया रंग है। जो देश की शक्ति और साहस को दर्शाता है। बीच की पट्टी का श्वेत धर्म चक्र के साथ शांति और सत्य का प्रतिक है। निचली हरी पट्टी उर्वरता, वृद्धि और भूमि की पवित्रता को दर्शाती है। सफ़ेद पट्टी पर बने चक्र को धर्म चक्र कहते है। जो तृतीय शताब्दी ईशा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए सारनाथ मंदिर से लिया गया है।
इस चक्र को प्रदर्शित करने का आशय यह है कि जीवन गतिशील है और रुकने का अर्थ मृत्यु है। उम्मीद है हम और आप इसे बखूबी समझते है अगर नही समझते है तो आइये इस समीकरण से खुद की मानसिकता को जोड़ कर इस देश में लहराते तिरंगा को एक नई उंचाई पर ले जाने की कोशिश करें।
आज हम ऐसे वक्त पर आ कर रुके है, जहाँ एक देश का गृहमंत्री आग बबुला दिख रहा है, देश की बर्बादी की अजब गजब तस्वीरें रोजाना समाचार पन्नों के सहारे इस देश की आवाम को मिल रही हैं।
देश की क्या शक्ति है ? हम भूल गए है।
देश का क्या साहस है ? हम भूल गए है।
इन सब के बीच देश के अंदर रह रहे आज़ाद मुल्क के भारतीय नागरिकों के लिए "हम सब कुछ सहन कर सकते है, लेकिन देश की बर्बादी जैसे नारों को बिल्कुल बर्दास्त नहीं किया जायेगा" यह गृहमंत्री का बयान बेहद चिंताजनक मुझे महसूस हो रहा है। यह वही देश के गृहमंत्री है जिसके हरियाणा में उग्र जाट आंदोलन के मुद्दे पर इनकी अपनी राजनीतिक पार्टी में घमासान मचा हुआ है। ऊपर का बयान जेएनयू में देश विरोधी नारे लगाने के बाद गृहमंत्री के द्वारा आता है और हरियाणा में एक तरफ राज्य सरकार हिंसक आंदोलन में मारे गए लोगों के परिजनोँ को मुआवजे का ऐलान करते है। यह वही गृहमंत्री है जिसके देश में खास कर हरियाणा में मौतों का आँकड़ा 20 पर पहुंच जाता है। इस गृहमंत्री से मैं पूछना चाहता हूँ क्या यह देश की बर्बादी नहीं? क्या आप इसे भी सहन करेंगे?
आपको एक बात जान कर ताज्जुब होगा कि यह गृहमंत्री इतने हिंसक आंदोलन के बाद नारद मुनी बने हुए थे क्योंकि आंदोलन और हिंसा से बनी स्थिति पर प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्र मोदी जी को जानकारी दे रहे थे। और एक और ताज्जुब करने वाली बात यह है कि वर्तमान की भारत सरकार के एक दूत वेंकैया नायडू जाट आंदोलन के संदर्भ में कहते दिखे कि "पहली प्राथमिकता शांति बनाए रखने की है। इसके बाद आरक्षण के पहलुओं पर बात की जाएगी" इनसे मेरा पहला सवाल यह है कि यह शांति बनाकर आरक्षण पहलुओं पर बात करने को कह रहे थे वह भी हिंसक जाट आंदोलन के नौ दिन बाद। यह नौ दिन पहले कहाँ थे ? क्या एनडीए सरकार शांति से आंदोलन करने वालों के लिए कभी अपने एजेंडा में प्राथमिकता देगी? क्या सरकार यह भी कहेगी कभी कि हम आंदोलनकारियों के पहलुओं पर हर हालत में बातचीत करेंगे?
अगर 'नही', तो क्या सभी आंदोलनकर्ता के पास एक ही विकल्प होगा कि आज़ाद भारत में खास कर मोदी सरकार में हिंसक आंदोलन ही कारगर तरीका है सरकारी तंत्र को जरूरत मंद मुद्दों से परिचित कराने के लिए। इस बात की पुष्टि सरकार को इस वक्त करनी होगी।


No comments:
Post a Comment