जैसे भी हो लड़ते झगड़ते 2020 के सफर में आ गए हैं
वर्ष 2003, राजकीय मध्य विद्यालय बलवा कुआरी में पांचवीं कक्षा में पढता था। विद्यालय के कक्षा में बैठने के लिए घर से बोरा लेकर आना होता था। कक्षा का माहौल तो ऐसा होता था जैसे हर दिन कोई एक हीरो बनेगा। कभी गुरु जी कविता सुनते तो, कभी सवाल जवाब और जब ये सब कुछ न होता तो खेल-कूद। जो जिस दिन बेहतर करता, वो उस दिन का हीरो होता था। विद्यालय में अपना तो एक अलग ही ट्रेंड था। कभी कोई लड़की कक्षा में आगे निकलती तो अगली बार उसे पीछे छोड़ने के लिए एक जुनून के साथ कक्षा में मेहनत करने की एक अलग ही जोश थी। मगर मासूमियत के उन दिनों में भी लड़कियों से पटना बड़ा मुश्किल था।
जिस लाइन में बैठा होता था अगर उसके बराबर के लाइन में कोई लड़की बैठी हो और वो अपना बस्ता (कॉपी-किताब) किसी पन्नी में लेकर आई होती थी तो भाई साहब उससे कक्षा में सबसे पहले झगड़ा होता था। शिक्षक अगर पाठ शुरू कर दिए और अगर उसके ओर से पन्नी की आवाज मुझ तक आ गई तो शिक्षक के पहले मैं उसे फटकार लगाया करता था। ये तो अपने दोस्तों के बीच की बात थी।
वर्ष 2006, कक्षा आठवीं में आ गया था एक दिन एक मैडम जी हम सभी बच्चों को इग्नोर करके दो-चार शिक्षक लोगों के साथ बातचीत कर रहे थे, उनकी छोटी सी बेटी थी जो कक्षा के लड़कियों के साथ पहली बेंच पर बैठी थी। (कक्षा 6 से बच्चों को बेंच पर बैठने की व्यवस्था थी) और कक्षा में शोर और पहली बेंच पर लगभग 5 या 6 लड़कियां मैडम की बिटिया के साथ खेल रही थी, मैंने अपने दोस्त से बोला यार ये क्या है? कक्षा में तमाशा हो रहा है। मैडम जी मस्ती कर रही हैं। इतना बोलना था कि वो लड़का खड़ा होकर मैडम जी से मेरी कम्प्लेन कर दिया कि मैडम जी, सिकेन आपके बारे में ऐसे-ऐसे बोल रहा है।
फिर क्या था। कक्षा एकदम शांत। सिकेन एक मात्र बच्चा, उस समय कक्षा में जो सजा पाने के लिए अपने जगह पर खड़ा था, मैडम जी सामने। उनका सवाल मगर बदले में मेरा कोई जवाब नहीं। डर तो लगता था मगर मैं भी बोल दिया कि ठीक है इस मैटर पर मैं हेड सर से बात करूंगा क्योंकि मुझे यहां पढ़ना है और मैं चाहता हूँ कि जो भी शिक्षक आये मेरे क्लास में वो हमें पढ़ाये। उसके बाद वो मैडम जी एक-एक कर बच्चे को अध्याय की रीडिंग लगवाना शुरू की मगर उसके बाद जो वो मैडम जी पर मेरा असर हुआ कि वो कभी भूल नहीं सकती।
वर्ष 2009, इंटरमीडिएट के स्टडी के दौरान 26 जनवरी पर विद्यालय में कार्यक्रम का आयोजन किया जाना था। सिकेन को भाषण देने के सिवा किसी और एक्टिविटी में मज़ा नहीं आता मगर कक्षा में एक लड़की टक्कर देने के लिए हमेशा सामने होती थी। कक्षा में जब कुछ बोलना होता था तो नए शब्दों के चयन के साथ खड़ा होना मेरा मकसद था। अपने दोस्तों के बीच मेरी आवाज और बातों को रखने का टूटा फूटा अंदाज ही मेरी सबसे अलग पहचान थी।
मैं भी खूब एन्जॉय करता था इस पर वर्कआउट करने में। कार्यक्रम के लिए मैंने 17 पन्नों का भाषण तैयार किया था। कार्यक्रम होस्ट करने के लिए उस लड़की ने बाजी मारी, मगर जैसे ही उसे पता चला कि मैं 17 पन्नों का भाषण देने वाला हूँ शिक्षक से समय की कमी का बहाना बताकर मेरा नाम कट कर दी। इस बात की जानकारी उसकी एक दोस्त ने मुझे दे दी, फिर क्या था? उसके सामने मैंने अपने भाषण के पन्नों पर लिखें शब्दों को कट किया और सीधा इवेंट कोऑर्डिनेटर जो शिक्षक थे उनके पास गया और बोला सर, मुझे सिर्फ 2 मिनट का समय चाहिए। सुनकर उन्होंने 'हाँ' किया।
मैं भाषण सिर्फ इस लिए देना चाहता था क्योंकि पहली बार मैं किसी सांसद के सामने भाषण देने वाला था। डॉ. सी.पी. ठाकुर साहब उस कार्यक्रम में शिरकत कर रहे थे। हालांकि बहुत कुछ मुझे उनके बारे में जानकारी नहीं थी मगर मैं बहुत उत्साहित था उनके समक्ष भाषण देने के लिए। मुझे मौका भी मिला और मैंने अपने भाषण का लगभग अंश वहां प्रस्तुत किया। भाषण के बाद मेरी एंकर दोस्त की जो नजरिया थी वो साफ़ बदल गई थी। उसे अफ़सोस भी था अपने पहले वाले मेरे प्रति व्यवहार को लेकर। उसने भी कहा था अच्छा बोलते हो। मैंने मुस्कुराते हुए बोला इसलिए नाम कट कर दी थी? फिर हमलोग अच्छे दोस्त भी बन गए थे।
धीरे-धीरे सफर 2011 में मीडिया स्टडी तक आई। उस दौरान भी 11 बजे समय पर लाइब्रेरी नहीं खुलने से भी एक महिला शिक्षिका को संस्थान के निदेशक के सामने जवाब देने पर विवश किया था। एक बार तो प्रैक्टिकल एग्जाम में बिना किसी आधार के नंबर देने पर भी मेरी पहल पर उच्च स्तरीय बैठक में एक मैडम जी को जवाब देना पड़ा था। एक बार की बात है कि मीडिया स्टडी के दौरान शिक्षक द्वारा कक्षा में ही सवाल तैयार करने और उस सवाल में उस संस्थान में प्रवेश के वक्त पूछे गए सवाल से एक सवाल मैच करने पर मैंने विरोध जताया था।
और गुस्से में आकर बोल दिया था मुझे 0 नंबर दे दीजिये। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मुझे फ़िक्र बस एक बात की होती थी कि इतनी मेहनत के जिस पैसे को दे रहे हैं उसके बदले में मुझे क्या मिल रहा है? मैं बहुत अग्ग्रेसिव होता था इन सब स्थिति में आकर।
वर्ष 2012, एक पत्रिका समूह के साथ काम कर रहा था। बॉस की बेटी ने अपने पापा से मेरी शिकायत की कि सिकेन आर्टिकल लिखने के बाद डिजाइनिंग वाले भैया से अपना नाम और पिक लगवाया और आर्टिकल किताब से देखकर लिखा है। जबकि प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित ईयर बुक से मैंने कुछ डाटा लिए थे मगर वो दोस्त इस बात को समझ नहीं पाई। फिर फाइनल प्रिंट जो पेज होने थे उसमें से मेरे नाम हटवा दी इस व्यवहार पर मुझे गुस्सा आया और सोचा इस पर कोई बातचीत या चर्चा नहीं। आज इतनी छोटी सी बात पर ऐसा माहौल है मुझे अब यहां नहीं रहना। अगले दिन शहर को छोड़कर दूसरे शहर में दूसरी नौकरी शुरू कर लिया।
वर्ष 2013, न्यूज़ रूम में एक मेरी सीनियर दोस्त के साथ भी अलग ही ड्रामा हुआ। टेलीफोन पर आने वाली ब्रेकिंग न्यूज़ को सुनकर लिखना भी मेरे लिए टफ था। मैक्सिमम रिपोर्टर कम्प्लेन करते यार सिकेन को सुनाई तो देता नहीं 4 बार बोलो तब जाके सुनता है मगर वो दोस्त हमेशा हेल्प करती थी। टेलीफोन पर सचमुच सुन्ना मेरे लिए मुश्किल काम था। एक दिन हम दोनों की लड़ाई हुई और मैंने न्यूज़ रूम छोड़कर बिना किसी से छुट्टी लिए या बताये अपने रूम पर आ गया। अगले दिन सोच लिया था अगर ऑफिस से बहार होना होगा तो हो जाऊंगा। डर तो लग रहा था उस दिन समय से पहले पहुँच गया था। अपने शिफ्ट में सबसे पहले दस्तक दिया। सच पूछो तो न्यूज़ रूम बिल्कुल पहले दिन जैसा नया लग रहा था। आराम से मॉर्निंग शिफ्ट वाले दोस्तों के साथ कोऑर्डिनेट करना शुरू किया फिर धीरे धीरे माहौल मेरे अनुकूल बनता चला गया।
न्यूज़ रूम में काम के दबाव इतने ज्यादा थे कि वो मेरी सीनियर परेशान हो जाती थी। फिर किसी काम को अगर मुझे उससे पूछना होता था तो हम दोनों की बात तो होती नहीं थी तो मुझे समझना पड़ता था कि वो जब स्टॉप करेगी तो उसके आगे का काम मेरा होगा मगर एक दिन मैंने उसके आगे का काम किया नहीं फिर जोड़ से चिल्लाई, उसने कुर्सी से उठने को बोला मैंने झट से साइड हुआ, न्यूज़ रूम में सब लोग बड़े प्यार से समझाते थे। हम दोनों की एक सीनियर थी वो तो मेरे 'गुड आफ्टरनून' बोलने का लॉजिक देकर बोलती थी कि सिकेन तो बहुत प्यारा बच्चा है। कितनी प्यार से बोलता है। उस एक दोस्त को छोड़कर किसी से ढिशुम ढिशुम नहीं हुआ। आस पास के सभी लोग जानते थे हम दोनों कभी कभी सबसे ज्यादा झगड़ते थे।
मगर हम दोनो अच्छे दोस्त भी थे। उससे मैंने फेसबुक को मिनीमाइज करके के चैट करना फर्स्ट टाइम सीखा था। जो लर्निंग के हिसाब से सबसे यूनिक और इंटरेस्टिंग आईडिया था। उस न्यूज़ रूम की एक और कंट्रोवर्सिअल कहानी थी। एक दिन अहम वक्त में अपने जगह पर नहीं होने की वजह से आउटपुट हेड को बॉस के तरफ से न्यूज़ रूम में फटकार पड़ी और उन्हें एक झटके में बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। उनकी बातचीत का तरीका मुझे भी पसंद नहीं आती थी बस आखिरी सन्देश में मैंने उन्हें लिखा कि आप कम्युनिकेशन फील्ड से आते हो साहब और बातचीत में कोई स्किल नहीं आपसे ये उम्मीद नहीं थी। अपने न्यूज़ रूम की आखरी दिन को याद रखियेगा।
ऐसे कई उदाहरण मैंने अब तक लगभग देश और विदेश के 18 बड़े संस्थानों में देखे हैं। मैंने अपने ज़िंदगी में यूनाइटेड किंगडम स्थित प्राइमस टेलीकॉम और ट्वेंटी फोर टॉक जैसे कम्पनीज के लिए काम कर 15 वर्ष की आयु से एक अलग अनुभव को जिया है। आज मैं स्वतंत्र काम कर रहा हूँ। इस दौरान अपने जिन दोस्तों को खोया हूँ, अपने जिन शिक्षकों को खोया हूँ आज मुश्किल से उन्हें ढूंढ पाता हूँ। उन सभी को बहुत याद करता हूँ, मगर मेरा नजरिया आज भी नहीं बदला है। सिकेन आप पर हर सवाल अपने उसी तेवर के साथ डालेगा जितनी संघर्ष मुझे उस काम को करने में महसूस होता है।
सिकेन के नज़र में किसी रिक्शा वाले भैया का जितना सम्मान घर करता है उतना ही सम्मान किसी सामने चेयर पर बैठे साक्षात्कार में किसी वीआईपी का। मेरे नज़र में या सवाल के सामने किसी भी व्यक्ति की कोई भी व्यक्तित्व हावी नहीं हो सकती। मैं हर किसी को भरपूर सम्मान और समय देता हूँ। अपने काम को लेकर मैं जितना ऑनेस्ट हूँ उतना ही मैं अपने आस पास के लोगों से भी ऑन टेबल उम्मीद करता हूँ।
कोई जितनी भी प्रभावशाली इंसान खुद को समझे, मैं उन्हें उतना ही सम्मान देना चाहता हूँ। मगर सिकेन के शब्दों के सामने कोई अपनी व्यक्तित्व को चुनौती देकर जब बनावटी दुनिया में प्रवेश करता है तो उसे सतर्क होने की जरुरत है।
सिकेन तो बहुत सामन्य सा इंसान है जो 99 प्रतिशत अपनी मेहनत की रकम भी अपने दोस्तों की सफलता में लूटा देता है। 1 प्रतिशत ही उसकी औकात है। फिर सिकेन को चुनौती कौन देगा और किस रूप में? मैं अपने लाइफ में किसी को खोना नहीं चाहता। कोई कितना भी बेकार इंसान हो उसे उतना ही सम्मान मिलेगा उसे उसकी बातों को मेरे समक्ष रखने का।
सिकेन दूसरों के लिए खुद को इतना ग्राउंड लेवल पर रखना चाहता है तो आपको सिकेन के साथ संघर्ष जैसी स्थिति क्यों?
अगर सिकेन से आपकी कोई मुलाकात याद हो तो सिकेन चाहता है कि आज कमेंट बॉक्स में सिकेन पर दो बातें हो क्योंकि कहते हैं न, 'हम हैं इस पल यहाँ, जाने हों कल कहाँ, हम मिले ना मिलें, हम रहें ना रहें, रहेगी सदा यहाँ, प्यार की ये दास्ताँ, सुनेंगे सदा जिसे, यह ज़मीं आसमां।
आपका
सिकेन शेखर बाजपेयी
3 comments:
Nice sir and nice lines written..
जबसे मैं आपसे मिला हु आपकीआवाज का तो मैं फैन हो गया हूं । और आप अपना काम भी मन लगा के करते है।।
Very nice sir
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