मैगज़ीन के मायने अक्सर दो तरीके से निकाले जाते है; एक पिस्तौल का पेट और साथ ही दूसरा पत्रिका। मायने दो भले है मगर इन सब के बीच समाज एक ऐसा अड्डा कह ले जहां ये खूब चलती हैं, खूब बिकती हैं। पिस्तौल के नाम से एक ख़ौफ़ को समझा जा सकता है मगर पुलिस के पास जो इसका इस्तेमाल है उसे देश गर्व से सलाम करता है। पत्रिका की स्थिति हम और आप बेहतर समझते है क्योंकि 10 रूपये, 20 रूपये और 30 रूपये में एकत्रित जानकारीयां वो भी एक साथ एक महीने की मिलजाएँ तो ऐसा लगता है जैसे मनो दुनिया वाकई मुट्ठी में है।
आप कही ऐसा तो नहीं सोच रहे कि सिकेन पिस्तौल और पत्रिका के कहानियाँ क्यों बेवजह बना रहा? मैं कहूंगा, पिस्तौल और पत्रिका पर कहानियाँ अच्छी लिखी जा सकती है मगर फ़िलहाल मैं आपको यह बताने वाला हूँ कि एक पत्रिका के विमोचन के मौके पर 'पुलिस महानिरीक्षक' श्री पारसनाथ ने मीडिया सम्बंधित मुद्दों पर अपनी वे बातें रखी जिससे आज के मीडिया को सीधे तौर पर सीख लेने की जरुरत है। उन्होंने साफ़ तौर पर कहा कि "समस्या दिखाना ही नहीं समाधान बताना भी मीडिया का परम कर्तव्य है", "आधुनिकता की चाहे जितनी दौर आये, मीडिया की प्रसांगिकता हमेशा बनी रहेगी".
वैशाली की धरती इस वक्त पत्रकारिता के एक नए माहौल में खुद को समाहित महसूस करने में सफल होगी। क्योंकि वैशाली के कई दिग्गज पत्रकारों ने पटना से 'दी आशी पोस्ट' को प्रकाशित करने का 'गौरवगाथा' की शुरुआत किया हैँ।
देश के युवा पत्रकार राहुल अमृत राज के द्वारा संपादित मासिक पत्रिका का विमोचन करते हुए 'उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में हुए क्रांतिकारी बदलाव की चर्चा की' और कहा कि 'पहले की अपेक्षा पत्र-पत्रिकाओं का संपादन-प्रकाशन कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है', पत्रकारिता के मूल्यों के साथ सामाजिक व् राष्ट्रीय दायित्वों के प्रति पत्रकारों को संवेदनशील होना जरुरी हो गया है। पत्रिका के स्वरुप में निरंतर निखार लाकर देश की अग्रीम पंक्ति के पत्र-पत्रिकाओं के समकक्ष खरी करने की शुभकमनाएं दी।
हम समझ सकते है कि पुलिस महानिरीक्षक के द्वारा उठाये इन बातों को एक लोकतांत्रिक देश में सुनना और समझना कितना महत्वपूर्ण हो गया है।
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