ये कौन लोग है जो ओलम्पिक खेल रियो 2016 से महिलाओं की स्थिति और हालात पर बात करने को मजबूर कर रहे हैं। जिनके वजह से आज भारत से बहार जा कर बैडमिंटन, टेनिस, एथलेटिक्स, कुश्ती, कलात्मक जिम्नास्टिक आदि गेम्स को खेलना महिलाओं के लिए होली काऊ बनने के स्थिति में आ गई है। भारतीय संविधान ने महिलाओं की स्थिति को बेहतर करने के लिए एक लंबा सफर तय किया। सुरक्षा की बात कही गई। पुलिसिया तंत्र बिठा दी गई ताकि इस देश की बेटियों को इस समाज में एक स्थान मिल सके। मेरठ जैसे जगह पर एक आम महिला के साथ अगर प्रताड्ना जैसी घटना होती है तो पुलिस एक एफआईआर दर्ज तक नही करती। कोई फेसबुक पर स्टेटस अपडेट नही होता? कोई खबर तक नही बनती? खबर उठाने वाले एक पत्रकार को जान से मारने की धमकी दी जाती है। ग्रामप्रधान सुप्रीम कोर्ट से भी तेज रफ़्तार में जस्टिस कर देता है। तब तो न्यूज़ चैनल वाले भी हाई प्रोफाइल न्यूज़ और इकॉनोमिक चर्चा करते आते है? क्या मेडल हासिल करने पर ही हम महिलाओं की ऊर्जा को इस तरह न्यूज़ में प्रोजेक्ट करेंगे? यह जानते हुए कि यहाँ सिर्फ 2-4 महिला ही जा सकती है, पहुँच सकती है।
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