Thursday, September 15, 2016

यह दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष है या सास बहू और साज़िश के सौतन

हालांकि इशारा तो बहुत हद तक आपको समझ आ ही गया होगा लकिन सबसे पहले सिकेन शेखर का यह सवाल- कभी आपने सोचा है कि महिला आयोग जैसे संस्थानों की जरूरत भारत में कब और किस स्थिति में महसूस हुई होगी? चलिए.....अगर यह सवाल आपके लिए कठिन है तो सवाल बदल देता हूँ। अगर मैं आपसे पूंछु कि किसी शहर में महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचार के खिलाफ किसी महिला अधिकारी को तैनाती मिल जाये तो क्या वहां कि महिला खुद को सुरक्षित महसूस कर पाएंगी? सोचिये जरा.......... अगर सिकेन शेखर का यह सवाल आपके लिए आसान है तो इस सवाल पर भी थोड़ा निर्णय करें  कि महिला अधिकारी को तैनाती मिलने के बाद अगर वह महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचारों के खिलाफ अगर आवाज़ ही न उठाये फिर उस अधिकारी और उस महिला आयोग का क्या? जो शिकायत या स्वतः संज्ञान के आधार पर महिलाओं के संवैधानिक हितों और उनके लिए कानूनी सुरक्षा उपायों को लागू कराती है। आज यह तमाम चर्चा इसलिए क्योंकि  एंटी करप्शन ब्यूरो ने दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल को पूछताछ के लिए नोटिस जारी किया है।

सूत्रों की मानें तो स्वाति से पूछताछ उन्हीं के दफ्तर में 19 सितंबर को  सुबह 11 बजे किया जाना है।  मामला ऑफिस में जरूरत से ज्यादा स्टाफ रखने का है। इस मामले में दिल्ली महिला आयोग की  पूर्व अध्यक्ष बरखा सिंह ने एक आरटीआई का हवाला देते हुए एसीबी में शिकायत की थी। बरखा ने शिकायत की थी कि महिला आयोग में 85  लोगों को गलत तरीके से रखा गया है और  इनमें 90 फीसदी आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता हैं। इससे पहले एसीबी महिला आयोग के दफ्तर में  भी छानबीन और पूछताछ कर चुकी है। यानि मामला बेहद स्पष्ट है कि 'स्वाती मालीवाल' दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष ने अपने पद व अधिकार का दुरुपयोग कर गैर कानूनी तरीके से कर्मचारियों की भर्ती की है। इन सब के बाद जब एंटी करप्शन ब्यूरो का जब नोटिस 'स्वाती मालीवाल' को मिला तो कुछ जिमेदारियों की एहसास हुई और महज कुछ ही घंटों के भीतर पलटवार करते हुए 24 महिला कांस्टेबल के साथ कथित तौर पर यौन उत्पीड़न मामले को लेकर दिल्ली के पुलिस कमिश्नर आलोक वर्मा को नोटिस भेज दिया।

शायद ही किसी ने सोचा होगा कि जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ टैग लाइन बनाकर अरविन्द केजरीवाल दिल्ली की सत्ता अपने नाम किये उसका हश्र यहाँ तक पहुँच जायेगा कि एक तरफ 'एंटी करप्शन ब्यूरो' अगेंस्ट 'चेयरपर्सन डेल्ही कमीशन फॉर वीमेन' और दूसरे तरफ 'चेयरपर्सन डेल्ही कमीशन फॉर वीमेन' अगेंस्ट 'डेल्ही पुलिस' क्या गजब स्थिति बन गई है।

मुझे नही लगता है इससे बड़ी कोई दूसरी क्राइसिस इस भारतीय प्रशासनिक तंत्र में हो सकती है। जंहा पुलिसिया तंत्र को इस देश की अन्दरूनी नागरिक सुरक्षा के लिये तैयार किया जाता है तो इसके ठीक विपरीत परिणाम आता है कि महिला कांस्टेबल ने ही लगाया इंस्पेक्टर पर आरोप। दरअसल इसका मतलब क्या है?  हम किस तरह के समाज में आ गए है? और यह सब एक तरफ तो दूसरी तरफ दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष पर एंटी करप्शन ब्यूरो जब धाबा बोलता है तो वह अध्यक्ष उस महिला कांस्टेबल की आवाज बनना मुनासिब समझती है  जिस  महिला कांस्टेबल के द्वारा इंस्पेक्टर पर आरोप लगाया जा रहा है। एंटी करप्शन ब्यूरो अगर इस अध्यक्ष के खिलाफ अगर शांत बैठ जाये तो दिल्ली महिला आयोग भी स्वाहा? क्या लगता है? आगे बढ़े........  उससे पहले जरा नजर राष्ट्रिय महिला आयोग के उदेश्य, कार्य एवं अधिकार पर-

उदेश्य

राष्ट्रीय महिला आयोग का उद्देश्य भारत में महिलाओं के अधिकारों का प्रतिनिधित्व करने के लिए और उनके मुद्दों और चिंताओं के लिए एक आवाज प्रदान करना है। आयोग ने अपने अभियान में प्रमुखता के साथ दहेज, राजनीति, धर्म और नौकरियों में महिलाओं के लिए प्रतिनिधित्व तथा श्रम के लिए महिलाओं के शोषण को शामिल किया है, साथ ही महिलाओं के खिलाफ पुलिस दमन और गाली-गलौज को भी गंभीरता से लिया है।

बलात्कार पीड़ित महिलाओं के राहत और पुनर्वास के लिए बनने वाले कानून में राष्ट्रीय महिला आयोग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अप्रवासी भारतीय पतियों के जुल्मों और धोखे की शिकार या परित्यक्त महिलाओं को कानूनी सहारा देने के लिए आयोग की भूमिका भी अत्यंत सराहनीय रही है।

कार्य एवं अधिकार

आयोग के कार्यों में संविधान तथा अन्‍य कानूनों के अंतर्गत महिलाओं के लिए उपबंधित सुरक्षापायों की जांच और परीक्षा करना है। साथ ही उनके प्रभावकारी कार्यांवयन के उपायों पर सरकार को सिफारिश करना और संविधान तथा महिलाओं के प्रभावित करने वाले अन्‍य कानूनों के विद्यमान प्रावधानों की समीक्षा करना है। इसके अलावा संशोधनों की सिफारिश करना तथा ऐसे कानूनों में किसी प्रकार की कमी, अपर्याप्‍तता, अथवा कमी को दूर करने के लिए उपचारात्‍मक उपाय करना है। शिकायतों पर विचार करने के साथ-साथ महिलाओं के अधिकारों के वंचन से संबंधित मामलों में अपनी ओर से ध्‍यान देना तथा उचित प्राधिकारियों के साथ मुद्दे उठाना शामिल है। भेदभाव और महिलाओं के प्रति अत्‍याचार के कारण उठने वाली विशिष्‍ट समस्‍याओं अथवा परिस्थितियों की सिफारिश करने के लिए अवरोधों की पहचान करना, महिलाओं के सामाजिक आर्थिक विकास के लिए योजना बनाने की प्रक्रिया में भागीदारी और सलाह देना तथा उसमें की गई प्रगति का मूल्‍यांकन करना इनके प्रमुख कार्य हैं।

साथ ही कारागार, रिमांड गृहों जहां महिलाओं को अभिरक्षा में रखा जाता है, आदि का निरीक्षण करना और जहां कहीं आवश्‍यक हो उपचारात्‍मक कार्रवाई किए जाने की मांग करना इनके अधिकारों में शामिल है। आयोग को संविधान तथा अन्‍य कानूनों के तहत महिलाओं के रक्षोपायों से संबंधित मामलों की जांच करने के‍ लिए सिविल न्‍यायालय की शक्तियां प्रदान की गई हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग भारतीय संसद द्वारा 1990 में पारित अधिनियम के तहत जनवरी 1992 में गठित एक संवैधानिक निकाय है।


सिकेन शेखर 

"अब आप जरा सोचिये....... दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष अगर अपने पर लगे आरोपों के बचाओं में आकर अपने जिम्मेदारियों का इस्तेमाल करती है तो इस समाज में किस तरह की आवाज महिलाओं के अधिकारों का प्रतिनिधित्व करने के लिए और उनके मुद्दों और चिंताओं के लिए प्रदान करना समझा जाये? जरा सोचिये और बियॉन्ड द थर्ड ऑय के कमेंट में अपनी प्रतिक्रिया अवश्य साझा करें"

1 comment:

Beyond The Third Eye said...

शेखर जी, कहते हुए अच्छा तो नहीं लगता ....क्योंकि खुद एक महिला होते हुए महिलाओं के विरुद्ध बोलना बुरा लगता है....लेकिन मेरा ये तजुर्बा रहा है कि किसी भी department में किसी भी पद पर बैठी महिला अधिकारी, generally महिलाओं की मदद नहीं करती ,इस बात का बहुत दुःख होता है।...कभी वक्त मिले तो पता लगाने की कोशिश कीजिएगा।- Hemlata Verma, Hajipur

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