बियॉन्ड द थर्ड ऑय में आपका स्वागत करूँ मगर कैसे? यह दरअसल सवाल है। स्वागत में प्रधानमंत्री मोदी जी के कुछ सकारात्मक क़दमों को अगर गिनाना शुरू करूँ तो आप खुश हो जायेंगे। मगर ''नही'', वैसे आपको खुश ही करना होता तो मैं प्रधानमंत्री मोदी और देश का ही चर्चा क्यों करता? राखी सावंत और राधे माँ की कहानियों में भी कई बातें ऐसी हैं जिसे आप जैसे लोगों को बता कर मैं खुश कर सकता था। आप लोगों ने बीतें दो दिन में मुझ पर जम कर धाबा बोला। गाली गलौज तक किये। सिर्फ इसलिए कि मैंने मोदी जी के खिलाफ अपने विचार साझा किये। जितनी ख़ुशी आपको मोदी जी के सकारात्मक ख़बरों को देख कर और सुन कर होती है ऐसा नही है कि मुझे आपके विपरीत दुःख होता है। मैं भी खुश होता हूँ। मगर चुनौतियों के साथ और आप जैसे लोग इन चुनौतियों को न तो समझ सकते है न ही सोच सकते हैं। फिर भी मुझे आपत्ति नही है। मेरे लिए सचमुच बहुत बड़ी चुनौती है कि मैं खुद को मोदी जी के खिलाफ कैसे स्टैंड करूँ। मोदी जी लॉन्ग जम्प और हाई जम्प की तरह स्पीच जम्प और ऑर जम्प में माहिर है। इनकी रफ़्तार को शून्य से गिनती प्रारंभ करने वाला ही एक मात्र व्यक्ति पकड़ सकता है। मुझे मालूम है आप गिनती एक से शुरू करते है। खैर, मैं आपको अध्यात्म की ओर नही भटकाना चाहता हूँ। मगर यह सच है कि मोदी जी के खिलाफ लिखने और सोचने के लिए मुझ जैसे एक बच्चे को कई बार सोचना पड़ता है। आप लोगों के लिए नही कि गाली और धमकी न देने लग जाएं। सोचना इसलिए पड़ता है कि इस देश के लिए कही मेरी यह राय बेतुका तो साबित नही होने जा रहा है। देश को लूटने वालों के समर्थन में तो नही होने जा रहा है। आपको शायद अनुमान नही होगा कि कभी-कभी मुझे मोदी जी के खिलाफ एक वाक्य लिखने के लिए उनके भाषण को 2-2 घंटे तक, एक ही भाषण को 5-5 बार कान और नाक को सावधानी से खोल कर सुनना होता है। समझना होता है। आप जितनी आसानी से कह जाते है कि सिकेन अपने पब्लिसिटी के लिए यह सब करता है। तो यह आपके शब्द आपके दलित होने की निशानी मुझे लगती है। मेरे नजरिया में दलित के मायने कुछ और नही है। जो मैं लिख रहा हूँ और जो आप समझ रहे है वही है। यह तमाम बातें सिर्फ इसलिए ताकि आप मुझे समझ सकें। आपके द्वारा हर तरह के शब्दों से की गई प्रतिक्रिया मेरे लिए महत्वपूर्ण है। आप अवश्य लिखें। अब आगे जरा मुद्दों पर नज़र-
हैशटैग की मदद से 5 अक्टूबर की सुबह मुझे लिखना पड़ा
#OpinionAgainstModi
आज शाम में अपनी बेबाक राय आप सभी से साझा करूँगा कि आखिर मुझे क्यों अपने प्रधानमंत्री मोदी जी पर गर्व नही होता? वह मुझे ढोंगी, झूठा, पोस्टर और प्रमोशनल मंत्री ही क्यों लगते है?
जिस लोकतंत्र में हम है, आप समझ सकते है कि इतनी बेबाक ओपिनियन के लिए मुझे कितनी जद्दो-ज़हद का सामना करना पड़ सकता है। जहाँ पक्ष और प्रतिपक्ष एक साथ अपने विचार एक ही मुद्दा पर जम कर रखते है। विरोद्ध करने का तरीका भी कई तरह के हैं। मोदी जी के खिलाफ मेरे द्वारा दिए बयानों को प्रूफ करने के लिए। मैं तैयार हूँ। सटीक, सरल और बेहद स्पष्ट शब्दों के सहारे।
आपसे अगर मैं पूंछू कि आप खुद पर कभी गर्व किये है? क्या कहेंगे? सोच लीजिए जरा ,,,,,,,,फिर मेरा अगला सवाल आपसे होगा कि कभी आपने सोचा है कि किसी पर गर्व करूँ उसके पहले गर्व करने के कुछ पैमाने को बनाया जाये? आप अगर मेरे आगे के शब्दों को पढ़ने के लिए बिना रुके, बिना समझे, बिना मेरे प्रश्नों का उत्तर दिए इच्छुक है तो आपसे मुझे कुछ भी उम्मीद नही है। एक बार सोचिये जरा कि क्यों किसी पर गर्व करें ? आखिर उसका पैमाने क्या हो सकता है जिसके वजह से गर्व करें? क्या गर्व ही एक शब्द है जिसे दो मिनट के मंडी में तवायफ़ की तरह आप इस्तेमाल करते है? आज दरअसल गर्व को अपने व्यक्तिगत रूची, फायदा और धंधों के लिए हमने इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।
''मोदी जी कहते है भाइयों-बहनों, योजनाओं का अटकना, योजनाओं का डिले होना, रुपयों कि बर्बादी होना एक प्रकार से क्रिमिनल नेग्लिजेंस है और उससे हमने पार करने का प्रयास किया है। आगे कहते है, भाइयों-बहनों, हम कितना भी काम करें, कितनी भी योजनाएं बनाए लेकिन सरकार सुशासन के लिए 'लास्ट मैन' डिलिवरी आखिरी इंसान को उसका लाभ कैसे मिलता है उस पर ध्यान देना होगा। आगे आप भाषण के अंश पढ़ेंगे तो आप माया जाल में फंसते चले जायेंगे। इसलिए रुकना पड़ेगा। इस बात को आपको सिकेन शेखर के नजरिया से समझना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सिकेन शेखर ने ही कहा है मुझे अपने प्रधानमंत्री मोदी जी पर गर्व नही होता? वह मुझे ढोंगी, झूठा, पोस्टर और प्रमोशनल मंत्री लगते है।
मोदी जी अपने भाषण में एक शब्द इस्तेमाल किये है 'लास्ट मैन' आप समझ सकते है हमारे समाज में किन लोगों के मद्देनजर इस शब्द का इस्तेमाल किया जा सकता है। आगे कुछ आपसे साझा करूँ देखिए जरा इस तस्वीर को-
आपके मन में कुछ ख्याल तो आ ही रहा होगा कि सिकेन इस तस्वीर में क्या दिखाना चाह रहा है? अच्छा समझ नहीं आ रहा है। चलिए..... कोई बात नही....... जरा देखिये दूसरी तस्वीर को-
जिस 'लास्ट मैन' शब्द का इस्तेमाल मोदी जी ने किया है उन लोगों के बीच मैं गया और जाना कि दरसअल जो प्रधानमंत्री जिस सिस्टम के सहारे, जिस खास शख्स का जिक्र कर रहे है वहाँ तक उनके ध्यान देने के बाद कोई हलचल है? किसी तरह कि सुगबुगाहट है? इन सब पर आज बातें होंगी। मैं हर उस बात का जिक्र करूँगा जिसे मैंने इस भारत माता के संतानों से मिल कर जाना। आप साफ़ तौर पर पहली तस्वीर में मेरे हाथों में देख सकते है कुछ पत्तों को। दूसरी तस्वीर में मोदी जी के द्वारा टॉस किये 'लास्ट मैन' वर्ड को समझाने की कोशिश कर रहा हूँ। तस्वीर में जिस पत्ते को आप देख रहे है वह दरअसल जंगली कुनरी के पत्ते हैं। इन्हें न तो यह खरीदना होता है न उपजाना। जँहा वे लोग रहते हैं। उसी के आस पास जंगलों में इन्हें आसानी से मिल जाती है।
जिस माता को आप देख रहे है इस पत्ते को सब्जी बनाने के लिए छाँट रही है वह मोदी जी को नही जानती, न ही सरकार की किसी सिस्टम को जानती है। आपको याद होगा मोदी जी एक बार जंगल शब्द का भी इस्तेमाल अपने भाषण में कर चुके है। मगर आश्चर्य की बात है कि उस जंगल शब्द के जो आस पास जिन शब्दों का उन्होंने ज़िक्र किया वह सिर्फ मोदी की ब्रांडिंग को बढ़ावा देता है। अगर ब्रांडिंग को बढ़ावा नही दिया होता तो कम से कम उस सन्देश की सुगबुगाहट यहाँ जरूर असर करती। और इन सब के बाद मुझे आपत्ति तब होती है जब इन बातों को कहने से मुझे कोई रोकता है। जब मैं इन बातों का ज़िक्र करता हूँ तो आप मुझे यह कहते है कि सिकेन शेखर खुद की ब्रांडिंग कर रहा है। फिलहाल बात जंगल की। मोदी जी कह रहे थे जो आदिवाशी जंगल में रहते थे। जो इस देश के लिए मर मिटे। उनके लिए हर राज्य के अंदर किसी एकांत जगह में एक बड़ा म्यूज़ियम बना कर उनकी याद को समेटेंगे। प्रयास अच्छी है। सोच अच्छी है। इन शब्दों का एलिमेंट्री शिक्षा प्राप्त कर के बैठे लोगों पर असर जबरदस्त हो सकता है। मगर सोचिये जरा.... मरने के बाद किसी की यादों को समेटना जब अच्छा हो सकता है तो उसी कम्युनिटी के जो लोग हैं। जो जंगलों में आज भी बिगड़े हालात की वजह से रहते हैं। जिनके पास न तो खाने के लिए कुछ सही चीज मुहैया हो पाती हैं। उनके लिए मोदी सरकार उनके जिंदगी में सिर्फ 'लास्ट मैन' डिलिवरी कह कर निकल जाते है।
http://www.tribal.nic.in यह मिनिस्ट्री ऑफ़ ट्राइबल अफेयर्स की वेबसाइट है। वक्त हो तो कभी देखिएगा। मोदी जी के पोस्टर भी मिलेंगे। प्रमोशन भी मिलेंगे। ऐसा लगेगा जैसे कि आदिवाशी 5 स्टार के माहौल में आ गए हो। ध्यान रखियेगा, वहां आप डिजिटल इंडिया के चकाचौंध में न फंस जाएं। वहां पर आपको संवैधानिक और कानूनी मामले, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, वन अधिकार अधिनियम 2006, वनबंधु कल्याण योजना, राज्य अनुदान, गैर-सरकारी संगठन/सार्वजनिक सहकारिता, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, शिक्षा, वित्त, अनुसंधान और मीडिया, सीपी एंड आर, समन्वय समिति, वार्षिक रिपोर्टें, नागरिक चार्टर एंव शिकायत निवारण तंत्र, संसद के सवाल/जवाब, स्वास्थ्य और आहार-पोषण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन, सामाजिक-आर्थिक तथा जाति जनगणना 2011, राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल, भर्ती और नियुक्ति आदि चीजें बहुत ही सुंदरता से मिलेगी।
क्या आपको आश्चर्य नही लगता जिसके लिए ये तमाम योजनाएं बनाई गई हो और इस योजना का जो 'लास्ट मैन' है, जिसे यह हक़ पहुँचाना है उसे पता ही न हो कि मेरे लिए कोई सिस्टम भी है। कोई मोदी भी है। और मोदी जी इस तरह के हालात को "क्रिमिनल नेग्लिजेंस" मानते है। बियॉन्ड द थर्ड ऑय मोदी जी को अगर क्रिमिनल बोले तो मोदी जी को भी इसमें कोई आपत्ति नही होनी चाहिए क्योंकि मोदी जी ने खुद कहा भाइयों-बहनों, हम कितना भी काम करें, कितनी भी योजनाएं बनाएं लेकिन सरकार सुशासन के लिए 'लास्ट मैन' डेलिवेरी आखिरी इंसान को उसका लाभ कैसे मिलता है उस पर ध्यान देना होगा और हमने उससे पार करने का प्रयास किया है। दरअसल इसी लाइन में मोदी जी की मायाजाल आप पर हावी होती है और आप बुरी तरह फंस जाते है। कभी आपने सोचा है कोई सरकार कोई काम करे और वह पूरी भी न हो और उस कार्य को सफल मान लिया जाये। यही हाल तो तमाम राजनितिक पार्टी की है। मगर अन्य पार्टी के किसी नेता के खिलाफ आवाज उठाने पर अब तक मैंने अपने ऊपर कभी इतनी धमकियाँ नही देखी जितनी मोदी जी के खिलाफ आवाज उठाने पर मुझे धमकियाँ देखनी पड़ी। मुझे लगता है मोदी जी के समर्थन में एक भारी संख्यां में गुंडों ने जगह बना ली।
हालांकि मुझे मालूम है मुझ जैसे लोगों को अगर मार भी दिया जायेगा तो इससे आने वाले समय में आप जरा सोचिये कि क्या आपको किसी नेता के खिलाफ कोई खबर मिलेगी? कोई ओपिनियन मिल सकेगा? आप कहते है सिकेन पब्लिसिटी बटोर रहा है। आप फेसबुक पर अनफ्रेंड कर दीजिये। जिस तरह आपके पोस्ट को एक या दो लोग पढ़ कर लाइक करते है मेरी भी यही हाल रहेगी। उन लोगों के बारे में भी सोचिये जो मोदी जैसे लोकप्रिय नेता के खिलाफ कोई अगेंस्ट ओपिनियन की प्रतीक्षा में बैठे हैं। उनका क्या होगा? उनके हक़ को तो मत मारिये। मोदी सरकार में फिफ्थ पिलर सुचना के अधिकार कानून को मोदी के गद्दार लोगों ने घर का पालतू जानवर बना दिया। आप अगर इनफार्मेशन के लिए फाइल करते होंगे तो आपको मालूम होगा।
आपने कभी सोचा है भारत की बड़ी समस्याओं में क्या कुछ लिप्त है। या सिर्फ आपने हर-हर मोदी और जय भारत-जय भारत करने का ड्रामा करना बेहतर समझा है। देशभक्ति का मतलब सिर्फ यही तक सिमित नही हो जाता है कि आप फ़िल्मी गीतों के सहारे साल में दो बार पुजारी बन कर भारत माता की जय करें। प्रधानमंत्री मोदी जैसे क्रिमिनल जो सिस्टम के लिए झूठ बोलता हो उसे भी पर्दाफास करना देश भक्ति है। आप माने चाहे न।
मुझे नही मालूम मेरे भारतीय मित्र भरतीय समस्याओं को कितना जानते हैं? लेकिन आपको इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि आपके लिए महत्वपूर्ण है कि विश्व स्तर पर भारत की पहचान सर्वश्रेठ किन समस्याओं को सुलझा कर बनाई जा सकती है न कि प्रधानमंत्री मोदी के मायाजाल वाले शब्दों के सहारे। पढ़िए जरा इन मुद्दों को-
द लिगेसी ऑफ़ पार्टीशन, डेंजरस ऑफ़ ग्लोबल इस्लामिक टेररिज्म, कम्युनल हारमनी एंड डिस्टॉर्टेड सेकुलरिज्म, अ टेर्रिब्ल मिस्टेक: इक्वैटिंग "धर्म विथ रिलिजन", द अन्फिनिश्ट एजेंडा ऑफ़ नेशनल इंटीग्रेशन, व्हाई ट्राइबल्स एंड नक्सल इश्यूज सडनली बिकम इम्पोर्टेन्ट, पावर्टी इन इंडिया, पापुलेशन स्टैबलज़ैशन, गवर्नेंस रिफॉर्म्स, राईट टू एजुकेशन, इकनोमिक रिफॉर्म्स एंड लिब्रलाइजेशन, ग्लोबल वार्मिंग, इकनोमिक ग्रोथ वर्सज़ डेवलपमेंट, रिन्यूएबल एनर्जी- सोलर एनर्जी, सिग्निफिकेन्ट पोलिटिकल डेवलपमेंट्स, क्राइम्स आदि।
प्रधानमंत्री मोदी को समझना बहुत आसान है। आपने कभी देखा है गाँव के लड़के को शहर की एक लड़की से जब शादी होती है तब कुछ तिलक-दहेज़ में जब बहुत सारा सामान मिलता है तो उसके परिवार में चर्चा किस कदर होती है? उस लड़के से आप मिलेंगे तो देख सकेंगे कि किस तरह से खुद को वह प्रोजेक्ट करता है? इस वक्त हालात कुछ ऐसा ही है। लड़के की क्षमता, स्थिति, हालात, उसका व्यवहार, सोच-समझ के सामने दूल्हे की ब्रांडिंग स्थान ले लेता है मात्र एक पल में। और अभी भारत में भी यही हाल है। देश क्या है? कहाँ है? कहाँ था? मोदी के रूप में कितना गंभीर प्रधानमंत्री मिला? मोदी का मंत्रिमंडल कितना पिछले भ्रष्ट सरकार से अलग सत्ता में आया? इसे कोई देखने वाला नही। प्रधानमंत्री मोदी को लोग बस दूल्हे की तरह लोग देख रहे हैं।
खैर, महंगाई की जिक्र में अगर महिला साथ हो फिर जरुरत के सामानों को समझना और जब वो सामान न मिले फिर वो आवाज को सुनना देश की सच्ची तस्वीर को बतलाती है।
इस तस्वीर में एक भारतीय महिला को आप देख सकते है जब मैंने उनसे पूछा कि सत्ता इस वक्त मोदी सरकार की है। कितना मुश्किल है घर चलाना? क्या घर में वे तमाम जरुरत के सामान हैं? अगर नही है तो कैसे सब कुछ आप संभालती है? उनका जवाब था, ''घुट कर मर रही हूँ'' उनसे मैंने पूछा आपके छोटे बच्चे है अगर आप घुट कर मरते हुए महसूस कर रही है तो आप अपने बच्चों के लिए क्या सोचती है? आपका बच्चा आगे चल कर करे, क्या सपना है आपका? फिर उन्होंने कहा, ''मैं चाहती हूँ कि यह पुलिस बने'', परिवार की हालात ऐसी है कि ज़िन्दगी घुट रही है फिर भी तमन्ना ऐसी है कि कल समाज सुरक्षित हो। क्या महंगाई सचमुच इतना हावी हो गया कि जंगल में अपने आप उवज रहे कुनरी के पत्तों के सहारे सब्जी की स्वाद और मौजूदा वक्त में पेट पालने का एक जरिया बनाने पर यह परिवार मजबूर हो चला है। 'लास्ट मैन' की इस हालात को मोदी जी जानते भी है? या नही, दरअसल सवाल है। लेकिन मोदी जी महंगाई पर जो कहते है उसे जरा समझिए।
भाइयों-बहनों, जिस प्रकार से पहले (कांग्रेस की सरकार में) महंगाई बढ़ती थी अगर उसी रफ़्तार से बढ़ी होती तो पता नही मेरे देश के गरीब का क्या हाल होता? इसको रोकने के लिए हमने भरपूर कोशिश की है। लेकिन फिर भी यह सरकार अपेक्षाओं से घिरी सरकार है। मेरे देश की देशवाशियों आपकी इच्छा में, स्वाभाविक है लेकिन मैं प्रत्यन करने की कोई कोताही नही बरतने दूंगा। जितना प्रयास मुझसे होगा मैं करता रहूँगा और गरीब की थाली महंगी नही होने दूंगा। आप समझ सकते है जिस 'लास्ट मैन' की गरीब की थाली की बात मोदी जी कर रहे है। उसकी थाली की कीमत क्या हो सकती है? और आप इस थाली की कीमत पता कर सकते है तो हिंदुस्तान की हकीकत क्या है आपको बताने कि जरुरत मुझ जैसे बच्चों को शायद ही पड़े।
खैर, मोदी जी के शब्दों में हिंदुस्तान की हकीकत या हिंदुस्तान की पहचान को समझना बड़ा दिलचस्प है। चलिए, फिर इसे भी समझते है। भाइयों-बहनों, मेरे सरकार की पहचान बनाने से ज्यादा मेरे हिंदुस्तान की पहचान कैसे बने उस पर बल है। दल की पहचान बने या न बने देश की पहचान बननी चाहिए। देश की पहचान बनेगी तो आने वाले सदियों तक हमारे आने वाले पीढ़ियों तक उसका लाभ होने वाला है। और इसलिए हमने सरकार की प्राथमिकता नही दी है। देश को प्राथमिकता दी है।
यह देश है कौन? विश्वबैंक की एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया में 2013 में गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की सबसे अधिक संख्या भारत में थी। रिपोर्ट के अनुसार उस साल भारत की 30 प्रतिशत आबादी की औसत दैनिक आय 1.90 डॉलर से कम थी और दुनिया के एक तिहाई गरीब भारत में थे। पॉवर्टी एंड शेयर प्रॉसपेरिटी (गरीबी और साझा समृद्धि) शीर्षक इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 'भारत सबके बीच ऐसा देश है जहां प्रति दिन 1.90 डॉलर की आय वाली गरीबी की रेखा के अंतरराष्ट्रीय मानक से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों की संख्या सबसे अधिक है। यह संख्या नाइजीरिया के 8.6 करोड़ गरीबों की संख्या के 2.5 गुणा से भी अधिक है। नाईजरिया दुनिया में गरीबों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। विश्वबैंक की रिपोर्ट के अनुसार 2013 में भारत में 30 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे रह रहे थे। गणना के हिसाब से उनकी संख्या 22.4 करोड़ थी। साल के दौरान पूरी दुनिया में गरीबों की संख्या करीब 80 करोड़ थी, जो साल 2012 की संख्या से 10 करोड़ कम थी। उम्मीद है, इन तमाम किस्सो के बाद आपकी नजरों में एक नई रौशनी जन्म लेगी। स्थिति दरअसल इतनी भी अच्छी नही है कि हर हालात में सिर्फ हर-हर मोदी कह के तमाम समस्याओं को नजर अंदाज कर दें।
दरअसल आज सबसे बड़ी समस्या यह हो चला है कि भारत की कैसी भी समस्या हो प्रधानमंत्री मोदी आपसे इतना जुड़ गए है कि आप सरकार पर एक सवाल खड़ा करने के स्थिति में नही है। और इसका सिर्फ एक कारण है कि प्रतिपक्ष मोदी सरकार पर निगाहें रखने में असफल है। आज प्रतिपक्ष के नेता 30 सेकंड के साउंड बाइट के सहारे मोदी जी पर हमला बोल कर खुद सवालो के घेरे में आ रहे है। आज मैं खुद को मोदी सरकार के खिलाफ उतारने को तैयार कर चूका हूँ सिर्फ इसलिए क्योंकि प्रतिपक्ष की भूमिका एक दिन मीडिया को ही लेना है। तो फिर इंतेज़ार क्यों?
आपका दोस्त,
हैशटैग की मदद से 5 अक्टूबर की सुबह मुझे लिखना पड़ा
#OpinionAgainstModi
आज शाम में अपनी बेबाक राय आप सभी से साझा करूँगा कि आखिर मुझे क्यों अपने प्रधानमंत्री मोदी जी पर गर्व नही होता? वह मुझे ढोंगी, झूठा, पोस्टर और प्रमोशनल मंत्री ही क्यों लगते है?
जिस लोकतंत्र में हम है, आप समझ सकते है कि इतनी बेबाक ओपिनियन के लिए मुझे कितनी जद्दो-ज़हद का सामना करना पड़ सकता है। जहाँ पक्ष और प्रतिपक्ष एक साथ अपने विचार एक ही मुद्दा पर जम कर रखते है। विरोद्ध करने का तरीका भी कई तरह के हैं। मोदी जी के खिलाफ मेरे द्वारा दिए बयानों को प्रूफ करने के लिए। मैं तैयार हूँ। सटीक, सरल और बेहद स्पष्ट शब्दों के सहारे।
आपसे अगर मैं पूंछू कि आप खुद पर कभी गर्व किये है? क्या कहेंगे? सोच लीजिए जरा ,,,,,,,,फिर मेरा अगला सवाल आपसे होगा कि कभी आपने सोचा है कि किसी पर गर्व करूँ उसके पहले गर्व करने के कुछ पैमाने को बनाया जाये? आप अगर मेरे आगे के शब्दों को पढ़ने के लिए बिना रुके, बिना समझे, बिना मेरे प्रश्नों का उत्तर दिए इच्छुक है तो आपसे मुझे कुछ भी उम्मीद नही है। एक बार सोचिये जरा कि क्यों किसी पर गर्व करें ? आखिर उसका पैमाने क्या हो सकता है जिसके वजह से गर्व करें? क्या गर्व ही एक शब्द है जिसे दो मिनट के मंडी में तवायफ़ की तरह आप इस्तेमाल करते है? आज दरअसल गर्व को अपने व्यक्तिगत रूची, फायदा और धंधों के लिए हमने इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।
''मोदी जी कहते है भाइयों-बहनों, योजनाओं का अटकना, योजनाओं का डिले होना, रुपयों कि बर्बादी होना एक प्रकार से क्रिमिनल नेग्लिजेंस है और उससे हमने पार करने का प्रयास किया है। आगे कहते है, भाइयों-बहनों, हम कितना भी काम करें, कितनी भी योजनाएं बनाए लेकिन सरकार सुशासन के लिए 'लास्ट मैन' डिलिवरी आखिरी इंसान को उसका लाभ कैसे मिलता है उस पर ध्यान देना होगा। आगे आप भाषण के अंश पढ़ेंगे तो आप माया जाल में फंसते चले जायेंगे। इसलिए रुकना पड़ेगा। इस बात को आपको सिकेन शेखर के नजरिया से समझना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सिकेन शेखर ने ही कहा है मुझे अपने प्रधानमंत्री मोदी जी पर गर्व नही होता? वह मुझे ढोंगी, झूठा, पोस्टर और प्रमोशनल मंत्री लगते है।
मोदी जी अपने भाषण में एक शब्द इस्तेमाल किये है 'लास्ट मैन' आप समझ सकते है हमारे समाज में किन लोगों के मद्देनजर इस शब्द का इस्तेमाल किया जा सकता है। आगे कुछ आपसे साझा करूँ देखिए जरा इस तस्वीर को-
आपके मन में कुछ ख्याल तो आ ही रहा होगा कि सिकेन इस तस्वीर में क्या दिखाना चाह रहा है? अच्छा समझ नहीं आ रहा है। चलिए..... कोई बात नही....... जरा देखिये दूसरी तस्वीर को-
जिस 'लास्ट मैन' शब्द का इस्तेमाल मोदी जी ने किया है उन लोगों के बीच मैं गया और जाना कि दरसअल जो प्रधानमंत्री जिस सिस्टम के सहारे, जिस खास शख्स का जिक्र कर रहे है वहाँ तक उनके ध्यान देने के बाद कोई हलचल है? किसी तरह कि सुगबुगाहट है? इन सब पर आज बातें होंगी। मैं हर उस बात का जिक्र करूँगा जिसे मैंने इस भारत माता के संतानों से मिल कर जाना। आप साफ़ तौर पर पहली तस्वीर में मेरे हाथों में देख सकते है कुछ पत्तों को। दूसरी तस्वीर में मोदी जी के द्वारा टॉस किये 'लास्ट मैन' वर्ड को समझाने की कोशिश कर रहा हूँ। तस्वीर में जिस पत्ते को आप देख रहे है वह दरअसल जंगली कुनरी के पत्ते हैं। इन्हें न तो यह खरीदना होता है न उपजाना। जँहा वे लोग रहते हैं। उसी के आस पास जंगलों में इन्हें आसानी से मिल जाती है।
जिस माता को आप देख रहे है इस पत्ते को सब्जी बनाने के लिए छाँट रही है वह मोदी जी को नही जानती, न ही सरकार की किसी सिस्टम को जानती है। आपको याद होगा मोदी जी एक बार जंगल शब्द का भी इस्तेमाल अपने भाषण में कर चुके है। मगर आश्चर्य की बात है कि उस जंगल शब्द के जो आस पास जिन शब्दों का उन्होंने ज़िक्र किया वह सिर्फ मोदी की ब्रांडिंग को बढ़ावा देता है। अगर ब्रांडिंग को बढ़ावा नही दिया होता तो कम से कम उस सन्देश की सुगबुगाहट यहाँ जरूर असर करती। और इन सब के बाद मुझे आपत्ति तब होती है जब इन बातों को कहने से मुझे कोई रोकता है। जब मैं इन बातों का ज़िक्र करता हूँ तो आप मुझे यह कहते है कि सिकेन शेखर खुद की ब्रांडिंग कर रहा है। फिलहाल बात जंगल की। मोदी जी कह रहे थे जो आदिवाशी जंगल में रहते थे। जो इस देश के लिए मर मिटे। उनके लिए हर राज्य के अंदर किसी एकांत जगह में एक बड़ा म्यूज़ियम बना कर उनकी याद को समेटेंगे। प्रयास अच्छी है। सोच अच्छी है। इन शब्दों का एलिमेंट्री शिक्षा प्राप्त कर के बैठे लोगों पर असर जबरदस्त हो सकता है। मगर सोचिये जरा.... मरने के बाद किसी की यादों को समेटना जब अच्छा हो सकता है तो उसी कम्युनिटी के जो लोग हैं। जो जंगलों में आज भी बिगड़े हालात की वजह से रहते हैं। जिनके पास न तो खाने के लिए कुछ सही चीज मुहैया हो पाती हैं। उनके लिए मोदी सरकार उनके जिंदगी में सिर्फ 'लास्ट मैन' डिलिवरी कह कर निकल जाते है।
http://www.tribal.nic.in यह मिनिस्ट्री ऑफ़ ट्राइबल अफेयर्स की वेबसाइट है। वक्त हो तो कभी देखिएगा। मोदी जी के पोस्टर भी मिलेंगे। प्रमोशन भी मिलेंगे। ऐसा लगेगा जैसे कि आदिवाशी 5 स्टार के माहौल में आ गए हो। ध्यान रखियेगा, वहां आप डिजिटल इंडिया के चकाचौंध में न फंस जाएं। वहां पर आपको संवैधानिक और कानूनी मामले, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, वन अधिकार अधिनियम 2006, वनबंधु कल्याण योजना, राज्य अनुदान, गैर-सरकारी संगठन/सार्वजनिक सहकारिता, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, शिक्षा, वित्त, अनुसंधान और मीडिया, सीपी एंड आर, समन्वय समिति, वार्षिक रिपोर्टें, नागरिक चार्टर एंव शिकायत निवारण तंत्र, संसद के सवाल/जवाब, स्वास्थ्य और आहार-पोषण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन, सामाजिक-आर्थिक तथा जाति जनगणना 2011, राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल, भर्ती और नियुक्ति आदि चीजें बहुत ही सुंदरता से मिलेगी।
क्या आपको आश्चर्य नही लगता जिसके लिए ये तमाम योजनाएं बनाई गई हो और इस योजना का जो 'लास्ट मैन' है, जिसे यह हक़ पहुँचाना है उसे पता ही न हो कि मेरे लिए कोई सिस्टम भी है। कोई मोदी भी है। और मोदी जी इस तरह के हालात को "क्रिमिनल नेग्लिजेंस" मानते है। बियॉन्ड द थर्ड ऑय मोदी जी को अगर क्रिमिनल बोले तो मोदी जी को भी इसमें कोई आपत्ति नही होनी चाहिए क्योंकि मोदी जी ने खुद कहा भाइयों-बहनों, हम कितना भी काम करें, कितनी भी योजनाएं बनाएं लेकिन सरकार सुशासन के लिए 'लास्ट मैन' डेलिवेरी आखिरी इंसान को उसका लाभ कैसे मिलता है उस पर ध्यान देना होगा और हमने उससे पार करने का प्रयास किया है। दरअसल इसी लाइन में मोदी जी की मायाजाल आप पर हावी होती है और आप बुरी तरह फंस जाते है। कभी आपने सोचा है कोई सरकार कोई काम करे और वह पूरी भी न हो और उस कार्य को सफल मान लिया जाये। यही हाल तो तमाम राजनितिक पार्टी की है। मगर अन्य पार्टी के किसी नेता के खिलाफ आवाज उठाने पर अब तक मैंने अपने ऊपर कभी इतनी धमकियाँ नही देखी जितनी मोदी जी के खिलाफ आवाज उठाने पर मुझे धमकियाँ देखनी पड़ी। मुझे लगता है मोदी जी के समर्थन में एक भारी संख्यां में गुंडों ने जगह बना ली।
हालांकि मुझे मालूम है मुझ जैसे लोगों को अगर मार भी दिया जायेगा तो इससे आने वाले समय में आप जरा सोचिये कि क्या आपको किसी नेता के खिलाफ कोई खबर मिलेगी? कोई ओपिनियन मिल सकेगा? आप कहते है सिकेन पब्लिसिटी बटोर रहा है। आप फेसबुक पर अनफ्रेंड कर दीजिये। जिस तरह आपके पोस्ट को एक या दो लोग पढ़ कर लाइक करते है मेरी भी यही हाल रहेगी। उन लोगों के बारे में भी सोचिये जो मोदी जैसे लोकप्रिय नेता के खिलाफ कोई अगेंस्ट ओपिनियन की प्रतीक्षा में बैठे हैं। उनका क्या होगा? उनके हक़ को तो मत मारिये। मोदी सरकार में फिफ्थ पिलर सुचना के अधिकार कानून को मोदी के गद्दार लोगों ने घर का पालतू जानवर बना दिया। आप अगर इनफार्मेशन के लिए फाइल करते होंगे तो आपको मालूम होगा।
आपने कभी सोचा है भारत की बड़ी समस्याओं में क्या कुछ लिप्त है। या सिर्फ आपने हर-हर मोदी और जय भारत-जय भारत करने का ड्रामा करना बेहतर समझा है। देशभक्ति का मतलब सिर्फ यही तक सिमित नही हो जाता है कि आप फ़िल्मी गीतों के सहारे साल में दो बार पुजारी बन कर भारत माता की जय करें। प्रधानमंत्री मोदी जैसे क्रिमिनल जो सिस्टम के लिए झूठ बोलता हो उसे भी पर्दाफास करना देश भक्ति है। आप माने चाहे न।
मुझे नही मालूम मेरे भारतीय मित्र भरतीय समस्याओं को कितना जानते हैं? लेकिन आपको इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि आपके लिए महत्वपूर्ण है कि विश्व स्तर पर भारत की पहचान सर्वश्रेठ किन समस्याओं को सुलझा कर बनाई जा सकती है न कि प्रधानमंत्री मोदी के मायाजाल वाले शब्दों के सहारे। पढ़िए जरा इन मुद्दों को-
द लिगेसी ऑफ़ पार्टीशन, डेंजरस ऑफ़ ग्लोबल इस्लामिक टेररिज्म, कम्युनल हारमनी एंड डिस्टॉर्टेड सेकुलरिज्म, अ टेर्रिब्ल मिस्टेक: इक्वैटिंग "धर्म विथ रिलिजन", द अन्फिनिश्ट एजेंडा ऑफ़ नेशनल इंटीग्रेशन, व्हाई ट्राइबल्स एंड नक्सल इश्यूज सडनली बिकम इम्पोर्टेन्ट, पावर्टी इन इंडिया, पापुलेशन स्टैबलज़ैशन, गवर्नेंस रिफॉर्म्स, राईट टू एजुकेशन, इकनोमिक रिफॉर्म्स एंड लिब्रलाइजेशन, ग्लोबल वार्मिंग, इकनोमिक ग्रोथ वर्सज़ डेवलपमेंट, रिन्यूएबल एनर्जी- सोलर एनर्जी, सिग्निफिकेन्ट पोलिटिकल डेवलपमेंट्स, क्राइम्स आदि।
प्रधानमंत्री मोदी को समझना बहुत आसान है। आपने कभी देखा है गाँव के लड़के को शहर की एक लड़की से जब शादी होती है तब कुछ तिलक-दहेज़ में जब बहुत सारा सामान मिलता है तो उसके परिवार में चर्चा किस कदर होती है? उस लड़के से आप मिलेंगे तो देख सकेंगे कि किस तरह से खुद को वह प्रोजेक्ट करता है? इस वक्त हालात कुछ ऐसा ही है। लड़के की क्षमता, स्थिति, हालात, उसका व्यवहार, सोच-समझ के सामने दूल्हे की ब्रांडिंग स्थान ले लेता है मात्र एक पल में। और अभी भारत में भी यही हाल है। देश क्या है? कहाँ है? कहाँ था? मोदी के रूप में कितना गंभीर प्रधानमंत्री मिला? मोदी का मंत्रिमंडल कितना पिछले भ्रष्ट सरकार से अलग सत्ता में आया? इसे कोई देखने वाला नही। प्रधानमंत्री मोदी को लोग बस दूल्हे की तरह लोग देख रहे हैं।
खैर, महंगाई की जिक्र में अगर महिला साथ हो फिर जरुरत के सामानों को समझना और जब वो सामान न मिले फिर वो आवाज को सुनना देश की सच्ची तस्वीर को बतलाती है।
इस तस्वीर में एक भारतीय महिला को आप देख सकते है जब मैंने उनसे पूछा कि सत्ता इस वक्त मोदी सरकार की है। कितना मुश्किल है घर चलाना? क्या घर में वे तमाम जरुरत के सामान हैं? अगर नही है तो कैसे सब कुछ आप संभालती है? उनका जवाब था, ''घुट कर मर रही हूँ'' उनसे मैंने पूछा आपके छोटे बच्चे है अगर आप घुट कर मरते हुए महसूस कर रही है तो आप अपने बच्चों के लिए क्या सोचती है? आपका बच्चा आगे चल कर करे, क्या सपना है आपका? फिर उन्होंने कहा, ''मैं चाहती हूँ कि यह पुलिस बने'', परिवार की हालात ऐसी है कि ज़िन्दगी घुट रही है फिर भी तमन्ना ऐसी है कि कल समाज सुरक्षित हो। क्या महंगाई सचमुच इतना हावी हो गया कि जंगल में अपने आप उवज रहे कुनरी के पत्तों के सहारे सब्जी की स्वाद और मौजूदा वक्त में पेट पालने का एक जरिया बनाने पर यह परिवार मजबूर हो चला है। 'लास्ट मैन' की इस हालात को मोदी जी जानते भी है? या नही, दरअसल सवाल है। लेकिन मोदी जी महंगाई पर जो कहते है उसे जरा समझिए।
भाइयों-बहनों, जिस प्रकार से पहले (कांग्रेस की सरकार में) महंगाई बढ़ती थी अगर उसी रफ़्तार से बढ़ी होती तो पता नही मेरे देश के गरीब का क्या हाल होता? इसको रोकने के लिए हमने भरपूर कोशिश की है। लेकिन फिर भी यह सरकार अपेक्षाओं से घिरी सरकार है। मेरे देश की देशवाशियों आपकी इच्छा में, स्वाभाविक है लेकिन मैं प्रत्यन करने की कोई कोताही नही बरतने दूंगा। जितना प्रयास मुझसे होगा मैं करता रहूँगा और गरीब की थाली महंगी नही होने दूंगा। आप समझ सकते है जिस 'लास्ट मैन' की गरीब की थाली की बात मोदी जी कर रहे है। उसकी थाली की कीमत क्या हो सकती है? और आप इस थाली की कीमत पता कर सकते है तो हिंदुस्तान की हकीकत क्या है आपको बताने कि जरुरत मुझ जैसे बच्चों को शायद ही पड़े।
खैर, मोदी जी के शब्दों में हिंदुस्तान की हकीकत या हिंदुस्तान की पहचान को समझना बड़ा दिलचस्प है। चलिए, फिर इसे भी समझते है। भाइयों-बहनों, मेरे सरकार की पहचान बनाने से ज्यादा मेरे हिंदुस्तान की पहचान कैसे बने उस पर बल है। दल की पहचान बने या न बने देश की पहचान बननी चाहिए। देश की पहचान बनेगी तो आने वाले सदियों तक हमारे आने वाले पीढ़ियों तक उसका लाभ होने वाला है। और इसलिए हमने सरकार की प्राथमिकता नही दी है। देश को प्राथमिकता दी है।
यह देश है कौन? विश्वबैंक की एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया में 2013 में गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की सबसे अधिक संख्या भारत में थी। रिपोर्ट के अनुसार उस साल भारत की 30 प्रतिशत आबादी की औसत दैनिक आय 1.90 डॉलर से कम थी और दुनिया के एक तिहाई गरीब भारत में थे। पॉवर्टी एंड शेयर प्रॉसपेरिटी (गरीबी और साझा समृद्धि) शीर्षक इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 'भारत सबके बीच ऐसा देश है जहां प्रति दिन 1.90 डॉलर की आय वाली गरीबी की रेखा के अंतरराष्ट्रीय मानक से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों की संख्या सबसे अधिक है। यह संख्या नाइजीरिया के 8.6 करोड़ गरीबों की संख्या के 2.5 गुणा से भी अधिक है। नाईजरिया दुनिया में गरीबों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। विश्वबैंक की रिपोर्ट के अनुसार 2013 में भारत में 30 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे रह रहे थे। गणना के हिसाब से उनकी संख्या 22.4 करोड़ थी। साल के दौरान पूरी दुनिया में गरीबों की संख्या करीब 80 करोड़ थी, जो साल 2012 की संख्या से 10 करोड़ कम थी। उम्मीद है, इन तमाम किस्सो के बाद आपकी नजरों में एक नई रौशनी जन्म लेगी। स्थिति दरअसल इतनी भी अच्छी नही है कि हर हालात में सिर्फ हर-हर मोदी कह के तमाम समस्याओं को नजर अंदाज कर दें।
दरअसल आज सबसे बड़ी समस्या यह हो चला है कि भारत की कैसी भी समस्या हो प्रधानमंत्री मोदी आपसे इतना जुड़ गए है कि आप सरकार पर एक सवाल खड़ा करने के स्थिति में नही है। और इसका सिर्फ एक कारण है कि प्रतिपक्ष मोदी सरकार पर निगाहें रखने में असफल है। आज प्रतिपक्ष के नेता 30 सेकंड के साउंड बाइट के सहारे मोदी जी पर हमला बोल कर खुद सवालो के घेरे में आ रहे है। आज मैं खुद को मोदी सरकार के खिलाफ उतारने को तैयार कर चूका हूँ सिर्फ इसलिए क्योंकि प्रतिपक्ष की भूमिका एक दिन मीडिया को ही लेना है। तो फिर इंतेज़ार क्यों?
आपका दोस्त,
सिकेन शेखर बाजपेयी
![]() |



8 comments:
Adv Krishna Sharma says : ''इस निर्भिक पोस्ट के लिये आप बधाई के पात्र है ,
मैने आपका पूरा ब्लोग ध्यान से पढा और लगा कि- मोदी जिस लास्ट मैन डिलिवरी की बात कर रहे है उस की परिभाषा उनको तब समझ आयेगी जिस दिन उनकी शाही थाली से 2000 rs वाले मशरूम की सबजी की जगह कुनरी के पत्तो की सब्जी जगह ले
बाकी तो जो भ्रमजाल है वो फैला रक्खा है भक्तो और बिकाऊ मीडिया ने''
Thank You very much
Shambhu Kumar says, Sikan shekhar vajpayee ji, jab insaan kisi me kamiya khojne nikle to aisa hi hota hai, 2013 ki report ka hawala dete hue kabhi dhyan aaya ki modi ji 2014 me p m bane, system ko badalna social media par likhne itna aasan nahi, apne bhi kitne saal lagaye honge education me tab aap likh paa rahe ho, or modi ji ka hisaab 2 saal me hi mangne lage, last man of society tak pahuchne me kuchh samay to lagega na so please when we have best option in politics, please wait a while
Thanks
Adv Krishna Sharma इस दलित शब्द ने ही तो देश का बेडागर्क कर रक्खा है
स्वर्ण और दलितो के बीच अब एक खाई नेताओ ने पाट दी जिसे हम सभी आरक्षण के राक्षष के रूप मे जानते हैं
Adv Krishna Sharma says, इस दलित शब्द ने ही तो देश का बेडागर्क कर रक्खा है
स्वर्ण और दलितो के बीच अब एक खाई नेताओ ने पाट दी जिसे हम सभी आरक्षण के राक्षष के रूप मे जानते हैं
🙄🙄🙄🙄
सहमत
Post a Comment