गुप्तेश्वर पांडेय साहब रात में नींद अच्छी आती होगी मगर दिन में कुछ लोगों को सोने की आदत होने लगी है। समाज की भी हकीकत आपको समझ में आती होगी मगर कुछ लोगों को अब आपकी हकीकत समझ में आने लगी है। शहर से लेकर गाँव में आतंक का छाया निवास करने लगा है।
आपके आने से और किसी के जाने से क्या फर्क पड़ा, जरा थाने में पहुंचकर एफआईआर के रद्दी के भाव बनने वाले टुकड़ों पर नज़र एक बार आपको डालनी चाहिए? समाचार के पन्नों की कीमत सबसे जल्द गिरती है, जरा सुर्ख़ियों को आपको समझना पड़ेगा? आखिर कब तक नीतीश कुमार के सेफ ज़ोन में कुशासन के चेहरे के मेकअप के सहारे चलते रहेंगे? आपके सामने आज का पत्रकार कॉंफिडेंट हो गया है हेडलाइन्स बनाने में। अब आप क्या वाकई चाहते हैं कि मैं उन सारे सुर्ख़ियों को आपको बताऊं जो पुलिस प्रशासन के लिए चुनौती है? आपको समझना पड़ेगा? और आपको समझना चाहिए!
साढ़े 14 अक्षर के सुर्ख़ियों में खुलेआम लिखा जा रहा है 'गोली मार कर हत्या' गोली के सामने आपकी बर्दी और ड्यूटी की हैसियत छोटी पड़ने लगी है। तभी तो कोई भी विवाद हो, कहीं की भी विवाद हो चलने से रूकती नहीं है। क्यों पांडेय जी? और जरा समझाइये आखिर इस गोली-बन्दुक के सामने आपकी नीति क्या है साहब? और इसके पहुँच के कौन कौन करीब है? और किसे होना था? किसे नहीं? साहब ये सिस्टम है और इसके सामने आपका चेहरा साफ़-साफ़ दिखता है।
सिटी में एसपी जिसे कहते हैं इन लोगों से केस दर्ज होने के बाद भी अब एक्शन फुटपाथ पर ही रह जाती है। रोड मैप को बस ड्यूटी और बर्दी के सामने सीमित कर दिया गया है। ड्यूटी का मतलब? किसी शहर में तैनाती का उदेश्य? ये आदर्श पुलिसिया सिस्टम के सामने समाज का माहौल? ये सब सवाल हो सके आपको फालतू लगे मगर आप सोचना शुरू कर लीजिये कि जिस रात में किसी को नींद अच्छी आती है अब कोई है जो दिन में नींद के इंतज़ार में बैठा है। और वजह आतंक ! अंधकार से ज्यादा अपराध का।

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