जिला पदाधिकारी मेरठ समीर वर्मा साहब आपने नौचंदी मेला में कमाल का प्रशासनिक व्यवस्था लगाया? चप्पे-चप्पे पर खोखला पुलिसिया तंत्र के साथ सीसी टीवी कैमरा लगवाया। मगर आपका यह कैसा तंत्र है जिसके बीच खुल्लम खुल्ला बाल मज़दूरी की यह तस्वीर मेरे बियॉन्ड द थर्ड ऑय के कमरे में कैद हुई। आपके प्रशासन सब के सब मौज़ूद है मगर उनके जेहन में इसकी भनक नहीं। जरा याद कीजिये भारत में बाल श्रम कानून को :
भारत में बाल मजदूरी की समस्या सभी के लिये स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही एक चिन्ता का विषय बन गयी है। भारत के संविधान की प्रारुप समिति इस संबंध में बिना किसी अन्य देश की सिफारिशों के आधार पर, अपने दम पर कानून तैयार करना चाहती थी। जिस समय भारत ब्रिटिश साम्राज्य के शोषण के अधीन था, उसने केवल यही बोध कराया कि प्रावधान शोषणकारी मजदूरी के रुप को ध्यान में रखकर बनाये गये है और भारत शोषणकारी नृशंस शासन व्यवस्था के बीच है।
भारत में बाल मजदूरी को रोकने के लिये बनाये गये प्रारम्भिक कानून जब बना तब बाल रोजगार अधिनियम 1938 पारित हुआ। ये अधिनियम बड़े दुखान्त अंत के साथ असफल हुआ। इसके असफल होने का सबसे बड़ा कारण गरीबी का होना था क्योंकि निर्धनता बच्चों को मजदूरी करने के लिये मजबूर करती है।
भारतीय संसद ने बाल श्रम या मजदूरी से बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये समय-समय पर कानून और अधिनियम पारित किये हैं। 14 साल की आयु से कम के बच्चों को किसी फैक्ट्री या खदानों में या खतरनाक रोजगारों (जहाँ जान जाने का ज्यादा जोखिम हो) में बाल मजदूरी को निषेध करने के लिये हमारे संविधान में अनुच्छेद 24 के अन्तर्गत मौलिक अधिकारों को स्थापित किया गया है। इसके अलावा, अनुच्छेद 21 को अन्तर्गत, ये भी प्रावधान किया गया है कि, एक राज्य 6 से 14 साल तक के बच्चे के लिए मुफ्त शिक्षा के लिये सभी आधारिक संरचना और संसाधन उपलब्ध करायेगा।
संविधान के तहत बच्चों की बाल श्रम से सुरक्षा का नियमन करने के वाले कानूनों का एक समूह मौजूद है। कारखाना अधिनियम 1948, 14 साल तक की आयु वाले बच्चों को कारखाने में काम करने से रोकता है। खदान अधिनियम 1986, 18 साल से कम आयु वाले बच्चों का खदानों में काम करना निषेध करता है। बाल श्रम अधिनियम (निषेध एवं नियमन) 1986, 14 साल से कम आयु वाले बच्चों को जीवन को जोखिम में डालने वाले व्यवसायों में, जिन्हें कानून द्वारा निर्धारित की गयी सूची में शामिल किया गया है, में काम करना निषेध करता है। इसके अलावा, बच्चों का किशोर न्याय (देखभाल और संरक्षण) अधिनियम 2000 ने बच्चों के रोजगार को एक दंडनीय अपराध बना दिया है।
आलोचनात्मक दृष्टि से, कानूनों की विशाल सारणी के बावजूद, बाल मजदूरों और नियोक्ताओं की कार्यकारी स्थितियों में कोई सुधार नहीं दिखायी देता है साथ ही बाल श्रम को निषेध करने वाले अधिनियम के प्रावधानों का स्वतंत्र रुप से उल्लंघन किया जा रहा है।
इस पर प्रकाश डालने की आवश्यकता है कि, इन प्रवाधनों का अतिक्रमण का अर्थ बुनियादी मानव अधिकारों का अभाव और बच्चों के बचपन को अर्थरहित करना है। बच्चे कहाँ और किस प्रकार के रोजगार के अन्तर्गत कार्य कर सकते हैं, के रुप में ये कानून अधिक स्पष्ट नहीं है। ये अधिनियम केवल 10% कार्यशील बच्चों को सुरक्षित करता है और इस प्रकार गैर-संगठित क्षेत्रों में लागू नहीं होता।
ये अधिनियम बाल मजदूर के परिवार को इस आधार पर भी छूट देता है यदि वो सभी बच्चों के रूप में एक ही कर्मचारी के साथ काम कर रहे हैं। यद्यपि, ये अधिनियम कुछ निश्चित जोखिम वाले उद्योगो और कारखानों में बच्चों के काम करने को निषेध करता है, लेकिन साथ ही ये खतरनाक कार्यों की व्याख्या नहीं करता। ये केवल खतरनाक रोजगारों की एक सूची प्रदान करता है।
खैर, जिन बच्चों की तस्वीर के सहारे मैं आपको संकेत कर रहा हूँ वे महज 5 वीं कक्षा के बच्चे हैं। इंतज़ार रहेगा मुझे आपके रिप्लाई का। बहुत बहुत शुक्रिया बियॉन्ड द थर्ड ऑय के साथ समय साझा करने के लिए।
सिकेन शेखर

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