मीडिया खबर के मंच पर इंडिया न्यूज के एडिटर इन चीफ दीपक चौरसिया जी आधुनिक टेलीविजन पत्रकारिता के जनक स्वर्गीय एस. पी. सिंह की पुण्यतिथि के मौके पर मीडिया खबर के द्वारा आयोजित ''परिचर्चा: राजनीतिक दलों की पत्रकारिता: वॅाररुम, सोशल मीडिया और प्राइम टाइम की बहसें'' पर 9 मिनट 56 सेकंड में अपनी जबरदस्त असरदार बातें कही।
सबसे पहले हिन्दी पत्रकारिता के युग पुरुष एस. पी. सिंह जी के श्री चरणों में सादर नमन करता हूँ । मेरे ख्याल से हिन्दी पत्रकारिता की इतिहास अगर लिखी गई है, तो वो एस.पी. सिंह से शुरु और एस.पी. सिंह से खत्म होना चाहिए था चुकी उन्होंनेँ ही हिंदी पत्रकारिता को जन-जन तक पहुँचाई और उसकी नींव रखी है और ये बात मुझे कहने में कोई गुरेज़ नही है। अपनी बात शुरु करु, मंच पर मेरे सभी सहयोगी बैठे हैं। मेरे तमाम सीनियरस बैठे हैं। जिन्होंने मुझे सिखाया हैं, आगे बढ़ाया हैं। उन सबका में अभिनंदन करता हूँ। बात शुरु करु उसके पहले एक बात कहना चाहता हूँ कि इंदौरी-इंदौरी की ज्यादा तारीफ कर देता है। निमिष भाई जो कुछ कहा उसमें आप 50 प्रतिशत काट लेना।
आज की पत्रकारिता पर एस.पी. क्या सोचते?
तो आज की जो मीडिया वॉररूम: फेसबुक, ट्विटर और प्रिंट ऑपरेट की जो पत्रकारिता हैं मुझे नही लगता कि एस.पी. को बड़ी पसंद आती होगी। कई तरह की शोज होती हैं, प्राइम टाइम की बहस होती हैं। अब सुनिए उस बहस की पीछे की हकीकत, में आपको बताता हूँ। गेस्ट कोऑर्डिनेटर कांग्रेस को फोन करता है, उसका पीआर पब्लिक रिलेशन सबसे पहले पूछता है, विषय क्या है? अच्छा रोबर्ट वाड्रा के खिलाफ कर रहे है, पूछना पड़ेगा। 3 घंटे बाद उसका फोन आता है, इस गेस्ट को पार्टी पर बोलने से मना किया है। अब बताइए बिना कांग्रेस के वर्ज़न से आप रोबर्ट वाड्रा पर क्या बहस करेंगे? कर लीजिए..... आप निष्पक्ष पत्रकारिता की बात करते है। दे दीजिए आप कांग्रेस का वर्ज़न।
आम आदमी पार्टी को अब फोन करते है। आम आदमी पार्टी पूछती है, किस पर बहस करेंगे आप? तो हम कहते है, प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव ने आप पर जो आरोप लगाए हैं हम उस पर बहस करेंगे। अरविंद केजरीवाल की जो स्टिंग ऑपरेशन वाली जो सीडी आई है आपके आम आदमी पार्टी के नेता ने जो सीडी जारी की है उस पर बहस करेंगे, तो कहते है, पार्टी ने इस पर बोलने से मना किया है। बीजेपी से जब पूछते है कि सुषमा स्वराज जी जो है, (समझाते हुए, मैं आपको एक छोटी उदाहरण दे रहा हूँ इसमें 19- 20 हो सकती हैं) वसुनधरा राजे जी का बचाव कर रही है। अब पार्टी ने इस पर कोई लाइन तैयार नही किया है। वो कहेंगे कि पार्टी ने उस पर बोलने के लिए मना किया है। ये तो कंट्रोलड है। आज की तारीख में किसी नेता से इंडिविजुअल लेवल पर बात कर के आप अपने पैनल में नही बुला सकते है। आज की तारीख में उनके मीडिया कोऑर्डिनेटर प्रोफेशनल तरीके से बातें करते हैं। गिने-चुने 3-4 लोग हैं। जिनको आप एक बजे या दो बजे अपने रिसर्च के टाइम में रिक्वेस्ट लिखाने के बाद वो अपने प्रवक्ताओं को पैनल पर रिवर्ट करेंगे और रिवर्ट करने के बाद वे आपको आधे-एक घंटे में जवाब देंगे की प्रवक्ता प्रतिनिधि जो है, इस हिसाब से एक्स बंदे, वाई बंदे या जेड बंदे को आपके पास भेजा जाएगा और उसी हिसाब से आपके टाइमिंग का सेलेक्शन होती है।
मुझे नही पता कि इस हकीकत को कितने लोग जानते हैं? और कितने लोग नही जानते हैं? ये टेलीविज़न जर्नलिज्म के हकीकत बन गया है ताकि पोलिटिकल पार्टी अपने हिसाब से चीजों को नीगलेट कर सके। इन्हें टेलीविजन चैनल को कोआर्डिनेट करना पड़ता हैं नही तो पॅालिटिकल डेस्क मिलना बंद हो जाएगा। अगर आपने वक्तिगत तौर पर किसी प्रवक्ता को बुला लिया तो पार्टी अगले दिन से आपको गेस्ट देना बंद कर देगी। अगर आपने हमसे बिना पूछे बुलाया तो अगले बार से हम आपको गेस्ट नही देंगे। यह एक हकीकत है। हो सकता है कि इन बातों से कई लोग सहमत नही हो कि यह पत्रकारिता का स्वरूप नही है इसे राजनीतिक दलों ने इस मॉडल को अडॉप्ट कर लिया है। इस स्थिति को किस हिसाब से समझा जाए? और किस हिसाब से रियेक्ट किया जाए? यह है राजनीतिक वॉररूम बनाने का नतीजा। ये बात तब चला जब उन्होंने वॉररूम बनाया। जहाँ तक मुझे याद पड़ता है, मैंने पहली बार वॉररूम शब्द जो है। 1993के चुनाव के समय में सुना था।
बाबरी मस्जिद ढाई जाने की बात हुए थे तब मैं तुरंत पत्रकारिता में आया था। तब वो एक वॉररूम बना था। हमारे एक मित्र है, उनके घर पर मित्र तो नही कहुंगा मेरे एक पोलिटिकल सोर्स है। उनके घर पर वॉररूम बने थे। उन्होंने ने कहा था, प्रमोद महाजन से। उसके बाद धीरे-धीरे आते-आते, 1998 के चुनाव तक कांग्रेस में होने लगा। बाकी पॉलिटिकल पार्टी ने भी फॉलो करने लगी और आज सब ने वॉररूम बना ली हैं। नितिश कुमार जी ने भी अपने घर में वॉररूम बना लिया है। मेरे ख्याल से वे उन लोगों को लेकर वॉररूम बनाया है। ख्याल से क्या ये निश्चित है। जिन लोगों ने नरेंद्र मोदी का कैंपेन किया था। जब वॉररूम बने तो टेलीविजन क्रांति आई। हर चैनलस की मिनट टू मिनट मौनिटरिंग होती हैं।कितने देर लाइव चला? कितने देर टेप चला? कितनी देर ब्रेकिंग न्यूज चली? टिकर पर क्या चला? चुकी पुष्कर ने इस तरह का टॉपिक रखा है तो मैं आपके सामने वो हकीकत बता रहा हूँ। यकीन मानीए तुरंत कॉल रिवर्ट होता है, फोन आता है कि ये आपने क्या चला दिया? बहुत आर्गनाइज्ड सिस्टम हो गया है पोलिटिकल पार्टी का। सोशल मीडिया पर आकर के बात खत्म करूँगा ट्विटर, फेसबुक- ललित मोदी एक इंसान लंदन में बैठा हुआ है। जिस दिन देश की एक बहुत बड़ी कंट्रोवर्सी ब्रेक होती है। वे विदेश में छुट्टीयां मनाते है। वहाँ पर बैठे-बैठे पुरी भारत सरकार को डिस्को डांडिया करा रहा है। जिसको जो कहना है कहे, इसके बारे में जो लिखना है लिखे, खुली छूट है, चाहे नाम से लिखना हो लिखिए, बिना नाम के लिखना हो लिखिए, चाहे अपनी पहचान रिलीज करना हो कीजिए, नही रिलीज करना हो नही कीजिए। वह पोलिटिकल पार्टी इंडिविजुअल नेता इस बात को अच्छे तरह से जानते है कि इसका राजनीतिक इस्तेमाल कैसे करना है? इन तीनों चीजों में भारतीय मीडिया की परिदृश्य को, भारतीय राजनीति की परिदृश्य, हम जैसा सोचते है उसके परिदृश्य, हम जैसा चिंतन करते है उसके परिदृश्य में हमारी सोच की परिदृश्य को पुरी तरह बदला गया है।
और अंत में यह बात कह के खत्म करूँगा कि मेरे ख्याल से हम सब की देश इतना परिपक्व है। यहाँ के लोग इतना परिपक्व है। हमारी आबादी का एक बड़ा हिस्सा युवा में, हमारी देश विश्व में सबसे बड़ा युवाओं का देश है। स्वतंत्र सोच हमारी प्रजातंत्र को आगे ले जाएगी और मुझे लगता है कि हमारे युवाओं में स्वतंत्र सोच कूट-कूट के भरा है। और अंत में यह कहना चाहूँगा कि हिन्दुस्तान का मीडिया, हिन्दुस्तान का अखबार हो या हिन्दुस्तान के टेलीविजन चैनल हो, इस दावे के साथ कह सकता हूँ कि पूरे दुनिया में सबसे ज्यादा स्वतंत्र है तो यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी मजबूती और यही सबसे गर्व करने वाली बातें है।
बहुत- बहुत शुक्रिया ।

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