सेवा में,
मैडम एसएसपी 'मेरठ' मंजिल सैनी,
विषय: #StepForReshma
'संतान के लिए ममता, समाज के लिए शील और विश्व के लिए करुणा संयोने वाली करुणामयी नारी को स्वयं के संतान के लिए न्याय की गुहार लगाते देखकर अपने औरत होने पर शर्मिंदगी महसूस हो रही है'
कहने के लिये आधी आबादी को समान दर्जा और अधिकार दे दिया गया है, लेकिन क्या वास्तविक जीवन मेँ उन्हें यह हक मिल पाया है? एक ज्वलंत सवाल सरकार, प्रशासन और समाज के सामने यक्ष प्रश्न के रूप मेँ परिलक्षित है। मेरठ की 'रेशमा' की दर्दनाक कहानी जानकर हैरानी नहीं हो रही है क्योंकी ऐसी न जाने कितनी 'रेशमा' न्याय की आश लिये पुलिस थाना की चक्कर लगा रही होगी? और अपराधी अपनी मस्ती मेँ न्याय की धज्जियां उड़ाते हुए रंगरेलियों मेँ लीन।
एक औरत का दुःख दर्द एक औरत ही समझ सकती है। कहा भी गया है कि बाँझ क्या जाने प्रसव की पीड़ा, जिस पति के साथ इसने हँसते-हँसते बाबुल का घर छोड़कर असख्यं सपने संजोय थे उसी ने इसे दुःख के दल-दल मेँ धकेल दिया।
उस पति को क्या सजा मिलनी चाहिये? रेशमा किससे न्याय की आशा करे? पुलिस थाना अपने कर्तव्य से विमुख। उलटे इसे ही उपेक्षा सहना पर रहा है। अगर पुलिस उचित कदम उठाकर अपराधी को सजा दिलवाये तो समाज मेँ इस तरह की घिनौनी हरकत करने से पहले इस तरह के व्यक्ति की रूह कांप जाये। लेकिन उलटे अपराधी बेखौफ घूमे और बेकसूर न्याय मांगने वाली को तिरस्कार मिले तो यह देश क्या कभी भ्र्ष्टाचार मुक्त हो सकता है? यह सोचनीय प्रश्न है कि जिस महिला का पति डेढ़ वर्षों से उसके बच्चों को लेकर गायब है उसकी क्या हालत होगी?
जिन नौनिहालों को अभी माँ की ममता मिलनी चाहिये ताकि वे पल्लवित, पुष्पित होकर देश के एक अच्छे नागरिक बनते वो इस सुख से वंचित हैं। पता नहीं, वह आततायी क्या सलूक उसके साथ करता होगा जो अपनी जीवन संगिनी को भी भूल गया? उस माँ के दुःख को, उसके आँसू को देखकर भी पुलिस का दिल क्यों नहीं पिघल रहा? सोचने पर विवश कर देता है।
लेकिन कुछ उम्मीद की किरण दिख रहा है क्योंकि वहाँ एक महिला पुलिस पदाधिकारी हैं। वह एक माँ के दुःख दर्द को समझ सकती है और जितनी जल्दी हो न्याय दिलवाने मेँ हर सम्भव कोशिश करेंगी।
मैं आपसे अपेक्षा करती हूँ कि उस निर्दयी पति को जल्द से जल्द गिरफ्तार करें और उसे कड़ी से कड़ी सजा दिलवाने मेँ रेशमा की सहायता करें। मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि तमाम मेरठ की महिलायें, स्वयं सेवी संस्थाएं इस मुहिम मेँ एक जुट होकर रेशमा को न्याय दिलवाने मेँ मदद करें।
मैं अपने पत्र के माध्यम से एक महिला पदाधिकारी से आग्रह और उम्मीद करती हूँ कि वे अपनी कुम्भकर्णी निद्रा से जागे और इस लाचार माँ की मदद करें जिसकी ये हकदार है। एक अबला और बेसहारा को उसके बच्चों से मिलवाकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें ताकि न्याय पर आम लोगों का भरोसा कायम रहें।
अन्यथा ये खाकी वर्दी अपने नाम से बदनाम तो है ही।
अंत में जयशंकर प्रसाद जी के शब्दों में नारी का चित्रण:
''अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी''
धन्यवाद !!
ममता की छाँव से वंचित एक जननी की दास्तान
'नाम- रेशमा की आवाज'
(#StepForReshma की मुहिम की आवाज बुलंद हो। इसके समर्थन में यह पत्र बिहार राज्य के हाजीपुर शहर के एक सरकारी माध्यमिक विद्यालय की प्रधानाचार्या श्रीमती बिभा कुमारी द्वारा लिखी गई है। अपनी कीमती प्रतिक्रिया कमेंट बॉक्स में जाकर दें। बहुत बहुत शुक्रिया)


1 comment:
Thanks Everyone to support #StepForReshma
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