Wednesday, July 19, 2017

पुलिस अपनी आइडियोलॉजी आम जनता के बीच लाने और समझाने में विफल क्यों?



आप लोगों ने कभी जानने की कोशिश किया हैं कि भारतीय पुलिस वर्ष 1947 से लेकर आज तक अपनी आइडियोलॉजी आम जनता के बीच लाने और समझाने में विफल क्यों रही है? इस सवाल को उठाना इस वक्त मुझे महत्वपूर्ण लगा चूंकि पिछले सप्ताह कई लोगों से मुझे पुलिस के खिलाफ बयान सुनने को मिला और जब बयानों के अर्थ समझने की कोशिश किया तो बड़ा आश्चर्य लगा। एक शख्स ने तो ताल ठोककर कहा कि पुलिस तो पैसे के बगैर काम ही नहीं करती। शायद उस शख्स के समक्ष जो पुलिस की करतूत सामने आई हो वो सचमुच सवाल के घेरे में हो सकता है। मैंने कोशिश किया उस शख्स को पुलिस के द्वारा बेहतर कामों के उदाहरण को गिनाने की पर उसने मानने से इंकार कर दिया। उसके जहन में पुलिस के प्रति विश्वास पूरी तरह से टूटी चुकी थी। दरअसल पुलिस का मतलब कुछ ऐसा जैसे उससे बहुत दूर की चीज हो। उधर बिहार के वैशाली जिला से भी एक खबर ने कुछ वक्त के लिए मुझे विचलित किया क्योंकि एक थाना पर गए एक शख्स ने जब एक गुंडे के प्रति एफआईआर दर्ज कराने की बात कही तो पुलिस ने आम जनता को गुमराह करते हुए बगैर एफआईआर दर्ज़  किये उस गुंडे को नसीहत देने की बात की और बदले में उस शख्स से कुछ पैसे भी ऐठ लिए। फिलहाल गुंडा अपने जगह फिट है, आम जनता अपने जगह और पुलिस भी पहले वाले अवतार में अपने जगह फिट है। इस मुद्दे पर मैंने एसपी से बातचीत भी किया मगर आगे के लिए बस एक चीज लगा कि बस कम्प्लेन किये जा जरूरत लगा तो पुलिसकर्मी या थाना अधिकारी को डांट फटकार कर लेंगे, मगर अच्छे वर्ग के अधिकारी इन चुनौतियों को सफाया करने के लिए आगे कभी नहीं आएंगे?

 आज की पुलिस की छवि अपने आप में चुनौती है? क्योंकि आम जनता बहुत गन्दी निगाहें से देखती है। मुझे नहीं मालूम इन मसलों पर पुलिसकर्मियों की क्या प्रतिक्रिया हैं? कई लोगों से मैं मिलता हूँ तो उनका कहना होता हैं, साहब वे लोग दिन रात लगे रहते हैं,  मेहनत करते हैं, परिवार से दूर रहते हैं,  हर वक्त ड्यूटी के लिए तैनात हैं, अपने आप में बड़ी बात है। इन बातों को सुनकर मुझे एक बात तो लगती ही है कि इस देश के जितने सच्चे और ईमानदार पुलिस अधिकारी या किसी भी रैंक का वो पुलिसकर्मी हो, वो कभी इन फिजूल की बातों से अपनी विश्वसनीय काम की ऐसे प्रस्थितियों से न तो कोई परिचय चाहेगा न ही कोई समाज में क्रेडिट की बात करेगा मगर जनता के सामने अगर पुलिसकर्मी की व्यवहार या किसी भी केस की प्रॉपर ट्रीटमेंट तक आम जनता और पुलिस के बीच की मुलाकात विश्वसनीय नहीं बन पा रही है तो इस वक्त फ़ौरन कदम बढ़ाने की जरुरत है। हालांकि मसला यही समाप्त भी नहीं होता है।

आज पुलिस के एक खास वर्ग के सामने यह भी एक सबसे बड़ी चुनौती है कि वह अपने अगले पीढ़ी को वर्त्तमान पुलिस के समक्ष जन्म ले रही चुनौतिओं से कैसे अवगत कराये ताकि पुलिस में भर्ती लेने वाले कैंडिडेट्स अपनी बेहतर नजरिया विकसित कर सके? यह सवाल इसलिए चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार को आने वाले चार वर्ष में पुलिस महकमे में सब इंस्पेक्टर और सिपाहियों के सभी रिक्त पदों को भरने का निर्देश दिया है। योगी की सरकार पहले से ही पुलिस के मुद्दे पर चारों तरफ से चर्चा से घिरी रही है। चाहे समाज में अपराध बढ़ने की हालात हो या फिर समाज में पुलिस की ही महफूज न होने की बात हो। ऐसे में आम जनता की स्थिति का क्या होगा? यह सवाल तो उठेगा ही और अगर आप योगी सरकार के नुमाइंदे पर गौर फरमाए तो ये लोग भी सीजनल हालात में पुलिस पर प्रतिक्रिया देते पिछले कई मौकों पर दिखाई दिए है। अभी हाल का ज़िक्र करूं तो मेरठ में ही भाजपा नेता के शो रूम से चोरों ने 8.45 लाख रूपये की चोरीकर एक बड़ी घटना को अंजाम दिया तो मौका पाकर भाजपाइयों ने जमकर पुलिस की कार्यशैली पर सवाल दागे। भाजपाइयों का एक सवाल बड़ा महत्वपूर्ण था कि पुलिस चौकी के पास अगर वारदात होगी तो जनता कैसे सुरक्षित महसूस करेगी? देखिये, मैं एक बार फिर कहूंगा, 'भाजपा बहुत ही सीजनल मिजाज से यह सवाल उठाई' अगर यही चोरी एक आम जनता के यंहा या अन्य किसी व्यक्ति के शो रूम हुई होती तो यही भाजपा कहती कि पुलिस जांच कर रही सरकार बदली है हालात बदल रही है।

खैर, आज की प्रशासनिक व्यवस्था पर हालात जानना बेहद जरुरी है चूंकि योगी और मोदी, मंत्री और नेताओं के दो सुपर ब्रांड बनकर उभर गए हैं और ऐसे में हालात ही मंत्री और जनता के बीच की खाई को बेहतर नाप सकता है। और इन सब के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पुलिसिया तंत्र की व्यवस्था को एक नए आइडियोलॉजी से पेश करते हुए क्रेडिट भी ले रहे है। आदित्यनाथ पुलिस रिफॉर्म की बातें और समाज में तमाम लोगों की सुरक्षा की बातों को भी गंभीरता से लेते है। हालांकि इस गंभीरता में थोड़ी गिरावट भी आई है क्योंकि ज़िम्मेदारी ज्यादा है और इनके आइडियोलॉजी पर पुलिस वाले अब तक पूरी तरिके से फिट नहीं हुए हैं और कभी-कभी तो इनके ही नेताओं की अजब रवैया भी देखने को मिली हैं। उदाहरण के लिए, याद होगी 'भाजपा नेता के बेटे की कार से हूटर उतरवाने और इंस्पेक्टर की वर्दी पर हाथ डालने की घटना के एक हफ्ते बाद इंस्पेक्टर और एसएसआई को थाने से हटा दिया गया था। पुलिस महकमे में चर्चा भी रही कि भाजपा नेताओं के दबाव में ये कदम उठाया गया था। और ऐसे बहुतेरे आरोप भाजपा के नेताओं पर लग रहे हैं मगर इसके मद्देनजर योगी शांत है। अपने नेताओं के साथ है। 

ऐसे में सवाल यह कि क्या उत्तरप्रदेश के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा चार वर्ष में पुलिस महकमे में सब इंस्पेक्टर और सिपाहियों के सभी रिक्त पदों को भरने का जारी निर्देश को ही सुरक्षा के दृष्टिकोण से और प्रदेश में प्रशासनिक माहौल को बेहतर ढांचा देने के लिए प्रयाप्त मान लिया जाए? खबर पर नजर ले चले तो पुलिसकर्मियों के आवास के लिए पहले चरण में 800 आरक्षियों, मुख्य आरक्षियों, उपनिरीक्षकों एवं निरीक्षकों के लिए श्रेणी-ए एवं बी की 800 यूनिट्स का निर्माण किया जाएगा। इस वित्तीय वर्ष 2017-18 में 33 हजार 200 पुलिसकर्मियों की भर्ती होगी, जिनमें 30 हजार सिपाही और 3200 दारोगा होंगे और पूरे पांच साल में डेढ़ लाख सिपाही भर्ती होंगे।

कानून व्यवस्था सुधारने को प्रयासरत योगी सरकार ने पहले बजट में यूपी पुलिस में सिपाही, दारोगा की भर्ती पर जोर दिया है। अगर इसे समाजवादी सरकार की व्यवस्था से देखा जाए तो बजट में एक हज़ार 90 करोड़ रुपये का इजाफा किया गया है। थाना से डीजीपी मुख्यालय सीसीटीवी से लैस होगा। इससे साफ़ जाहिर है कि हाई टेक टेक्नोलॉजी के बीच पुलिस को जवाबदेह बनाने की दिशा में उठाया गया यह कदम है। ऐसे में इस सवाल का जिक्र तो आएगा ही न कि इससे क्या पुलिस की छवि भी अपने आप सुधर जायेगी जो आम जनता के बीच धूमिल और अशुद्ध हैं? अगर नहीं तो योगी सरकार पांच साल बाद इन चुनौतियों पर नसीहत देगी?

बजट में पुलिस की विवेचना की गुणवत्ता सुधारने के लिए विधि विज्ञान प्रयोगशालाओं को आधुनिक बनाने के लिए 10 करोड़ का इंतजाम किया गया है। कारागार के भोजनालयों (पाकशाला) को आधुनिक बनाने की दिशा में भी कदम उठाया गया है। इस मद में पांच करोड़ आवंटित किए गए हैं।

तो साफ़ है कि पुलिस के लिए आवंटित बजट से सरकार फिलहाल पुलिस बल की तादाद बढ़ाने व थानों को जवाबदेह बनाने पर फोकस कर रही है।  ऐसे में सरकार के पास एक आशा और उम्मीद की छवि बनाने की मौका भी आप बखूबी समझ सकते हैं। जरा सोचिये न कि वर्ष 2017-18 के लिए अगर पुलिसकर्मियों की भर्ती कर भी लेती है और समस्याएं जस की तस रही तो फिर चर्चा में होगी ही न कि अब अगले वर्ष की के लिए पुलिसकर्मियों की भर्ती की प्रक्रिया शुरू तो फिर आम जनता सोचेगी कि बहाली तो हो ही रही है, तो व्यवस्था भी सुधर ही जाएगी? ऐसे में आम जनता का क्या हश्र होगा इसका जरा भी अनुमान है आपको? हश्र यही होने वाला है कि ख़बरों से ही आम जनता तसल्ली करते रहेगी कि अब भर्ती हुई है तो समाज में व्यवस्था बेहतर होगी मगर वह व्यवस्था कैसी होगी उसका अनुमान काले छाये की तरह जो दिखती तो है मगर इस तस्वीर का नाम क्या दें जैसी स्थिति होगी? क्योंकि छाया तो बस छाया ही होती है।





आप अपनी प्रतिक्रिया या सुझाव देना न भूले;
 सिकेन शेखर 


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