*बियॉन्ड द थर्ड ऑय द बिग कन्वर्सेशन के मंच पर समाज सेविका सरिता राय
*स्वाभिमान लोक सेवा संस्थान, ई-रेडियो और सुदर्शन न्यूज़ वैशाली के संयुक्त तत्वाधान में हुआ आयोजन
*8 मार्च 2018 को स्वाभिमान भवन में हुआ था अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर द बिग कन्वर्सेशन का आयोजन
| समाज सेविका सरिता राय बियॉन्ड द थर्ड आई के द बिग कन्वर्सेशन के दौरान |
बियॉन्ड द थर्ड आई ‘द बिग कन्वर्सेशन’ में सिकेन सबसे पहले सरिता राय के इस संबोधन को सुनने के बाद कानून के रखवालों की हकीकत जानने की कोशिश में सवाल किया, आपने सवाल क़ानूनी कार्यवाई को लेकर रख दिया? मतलब कानून कि स्थिति क्या है समाज में? प्रशासन क्या कमजोर नज़र आ रही है? जिससे आप लोगों को आगे आना पर रहा है? सरकार की क्या स्थिति है तमाम क़ानूनी कार्यवाई को लेकर और सबसे महत्वपूर्ण कि जब ये ग्रामीण महिलाएं किसी भी समस्या को फेस करती हैं तो सिस्टम फ्रेंडली नज़र नही आती है क्या?
इस पर समाज सेविका सरिता राय ने अपने जवाब में कहा, देखिये, कानून की बात मैं करूं तो मैं कहूंगी, खासकर भारत की महिलाएं जो होती है वह प्यार और समर्पण के भावना के लिए जानी जाती हैं तो महिलाएं जो हैं इतना प्यार और समर्पण में ग्रसित होती है कि जब उनके साथ कुछ गलत होता हैं तो उसके खिलाफ आवाज उठाने में डर जाती है और वह ख़ुद को ऐसा मान लेती हैं कि हम सिर्फ इसी के लिए जाने जाते हैं चुंकि बचपन से सिखाया गया हैं कि समर्पण रखों, प्यार रखों, तो कही न कही डर होता है जिसके वजह से चाह कर भी बोल नही पाती हैं।
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‘द बिग कन्वर्सेशन’ में बियॉन्ड द थर्ड आई का अगला सवाल था कि अंतरराष्ट्रिय महिला दिवस की अहमियत को आज के दिन किस तरह से परोसने की जरुरत दिखती है? जवाब में कहा, आज की अहमियत को मेरा जो मानना है आज महिला दिवस जो है, महिला के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है। मैं अगर कहूँ तो महिला दिवस एक दिन नही होना चाहिए। हमारा दिवस तो हर रोज है। महिला दिवस क्या हम एक दिन मना रहे हैं? एक दिन बस हम याद करते हैं कि भाई हम भी स्ट्रोंग हैं। ये जो दिन हैं याद करने का दिन है कि हम भी स्ट्रोंग है।
‘द बिग कन्वर्सेशन’ में अगला सवाल था कि जब आप ग्रामीण महिलाओं को देखती है तो इन्हें सशक्त करने के लिए और किस तरह के कदम उठाने की जरुरत दिखती है समाज में? जवाब में कहा, मुझे जो लगता है, मैं कई सालों से स्लम क्षेत्रों में कार्य कर रही हूँ। ग्रामीण महिलाओं को किसी चीज का पता नही होता। जैसे सेनेटरी पैड अभी हमलोगों ने सेनेटरी पैड पर हमलोगों ने जागरूकता अभियान चलाई। अभी गाँव में बहुत सारी महिलाएं हैं, जिसे सेनेटरी पैड के बारे में नही पता है तो मुझे लगता है कि जिस 2018 के ज़माने में हम आ गए हैं ख़ुद को हम मॉडर्न बोल रहे हैं उसके पीछे देखे तो ग्रामीण महिलाओं को कई चीजों के बारे में जानकारियां नही हैं तो हमारे समाज के जो बुद्धिजीवी वर्ग के जो लोग है अगर अपने-अपने तरीकों से हर मोहल्ले में, हर महिलाओं को जागरूक करें तो मुझे लगता हैं कि देश को विकसित राष्ट्र बना सकते हैं।
| 8 मार्च 2018 को समाज सेविका सरिता राय और बियॉन्ड द थर्ड आई के फाउंडर सिकेन शेखर द बिग कन्वर्सेशन के दौरान |
‘द बिग कन्वर्सेशन’ में अगला सवाल था कि प्रशासन को और किस तरह से पहल करने की जरुरत को आप देखती है जिससे महिलाएं अपनी समस्याएँ को समाधान करने में सफल हो सके?
सरिता राय ने अपने जवाब में कहा, देखिये, यहाँ पर सिर्फ प्रशासन ही नहीं बल्कि, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया ये तमाम जो लोकतंत्र के स्तंभ कहे जाते हैं सभी को अपने अंदर संवेदनशीलता लाने की जरुरत हैं अगर कार्यपालिका को 12 साल के बच्चे वाले केस में संवेदनशीलता नज़र आती तो वह बच्चा जुवेनाइल नहीं कहा जाता। वह जेल में इस वक्त नहीं होता।
‘द बिग कन्वर्सेशन’ में सरिता राय से अगला सवाल था कि देखिये, हमलोग 2018 में आ गए हैं, सामने 2019 है, मोदी लहर की जब बात होगी तो महिलाओं के सन्दर्भ में तमाम जुमलेबाजी हमें नज़र आएगी तो ऐसे में नेताओं के लिए क्या संकेत है?
जवाब में कहा, मेरा जो मानना है मैं किसी पार्टी और पॉलिटिक्स की बात नहीं करूंगी। मैं एक साधारण समाजसेविका हूँ तो सत्ता में कोई भी सरकार हों इनकी बड़ी योगदान हैं देश की विकास में और एक बात यह भी है कि आज कल नेता लोग सुख भोगने के चक्कर में ज्यादा रहते हैं तो यह जो सुख भोगने की जो दिलचस्पी है ना? तो इस दिलचस्पी से अलग हट के महिलाओं के समस्या और दर्द देखकर सही एक्शन प्लान करें।
| स्वाभिमान भवन में 8 मार्च को आयोजित कार्यक्रम के दौरान महिलाएं |
‘द बिग कन्वर्सेशन’ में सरिता राय से आख़िरी सवाल था कि जब प्रशासन की बात हो तो देश का कोई हिस्सा दिखता है जहां महिलाओं के लिए वहां का माहौल बेहतर नज़र आती है?
देखिये, मैं ख़ुद नार्थ ईस्ट से आई हूँ। मेघालय का ज़िक्र मैं करूंगी क्योंकि वहां की महिलाएं पूरी तरह सशक्त दिखती हैं। जिस तरीके से अन्य जगहों पर कई चीजें पुरुषों के नाम पर होती है। वैसे ही वहां महिलाओं के नाम पर चीजे होती है तो अन्य जगहों की तुलना में मणिपुर, मेघालय की महिलाएं बहुत ही सशक्त हैं। हमारे यहाँ क्या है कि समाज में पुरषों की वर्चस्प अधिक है इसलिए महिलाओं की सुनी नही जाती है और जिस समाज में महिलाओं की सुनी जाती है वहां की स्थिति महिलाओं के लिए बेहतर हैं जिससे हमें सीखने की जरुरत हैं।

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