![]() |
| रंजना वर्मा |
तुम समझो अगर दिल की गहराई को,
कुछ सुनाना चाहती हूँ तमाशा ना बनाओ अगर जो तुम मेरी बातों का,
कुछ बताना चाहती हूँ,
निकली हूँ डर के अंधेरों से बाहर,
काले बसेरे से बाहर आना चाहती हूँ,
अपने चेहरे से खौफ को जुदा कर,
दिल खोल मुस्कुराना चाहती हूँ,
मंजिल की तालाश में ना जाने किन रास्तों पर हूँ मैं,
अब ख़ुद की मंजिल, ख़ुद की डगर, ख़ुद रास्ता बनाना चाहती हूँ मैं,
हवस भरी निगाहों में तो रही हूँ मैं हरदम,
क्या गलत करती हूँ जो खुदको उनसे बचाना चाहती हूँ.
गिरी हूँ, उठी हूँ. गिरने का दर्द जानती हूँ,
यही तो कारण है कि गिरतों को उठाना चाहती हूँ.
बेशक तुम्हें यकीन ना हो मुझपर,
पर साथ चलो तो सही,
देखो मैं कितने चेहरों पर हसी को लाना चाहती हूँ.

No comments:
Post a Comment