Sunday, September 29, 2019

पत्रकारिता कल्चर में DIG विकास वैभव की भूमिका परदे के पीछे तो नहीं? सिकेन शेखर




खबरों के सामने एक बड़ी संकट है। भागलपुर रेंज के पुलिसिया सिस्टम को इस खबर को पढ़कर अपनी वर्दी के रंग को समझना चाहिए कि अब रंगहीन हो गया है। ये कौन रिपोर्टर है? कैसा रिपोर्टर है? जब पूजा के सिर में गंभीर चोट लगी तो रिपोर्टर को अपने खबर में ये कहने में दिलचस्पी है कि उसे पुलिस ने अनुमंडल अस्पताल में भर्ती कराया। खबरों में बेशर्मी की लकीरों को कैसे बनाया जाता है जरा समझिये। 'घायल की मां ने कहलगांव थाने में कांड अंकित कराया और पुलिस मामले की जांच में जुटी है।' ट्रेंड बना हुआ है खबरों में 'पुलिस मामले की जांच में जुटी' कह कर समाप्त करने की। कैसे सुबह में भागलपुर के तमाम पुलिस अधिकारियों को खबरों के साथ चाय की चुस्कियों में मज़ा आता होगा?


डीआईजी विकास वैभव भी इधर के क्षेत्रों में एक्शन मोड पर हैं तो साहेब को अपनी भूमिका को परदे के पीछे खबरों में रखने के लिए पत्रकारों के द्वारा एक कवर स्टोरी तो नहीं दिया जा रहा है? अगर नहीं तो साहेब जरा बताये कि पेपर छपने के कितना समय पहले पुलिस के द्वारा इस मामले पर कार्यवाई हुई? और किस तरह की कार्यवाई हुई?  बेशर्म पत्रकारों ने सिर्फ इतना कह कर कि पुलिस मामले की जाँच में जुटी है' अपनी खबर के माध्यम से पत्रकारिता और पुलिसिया सिस्टम की एक वाहियात तस्वीर समाज में विकसित होने के लिए 72 वर्ष के भारत के दहलीज पर छोड़ दिया है। एक 12 वर्ष की पूजा के आरोप जिसमें वह कह रही है कि बच्चों के विवाद में रंजन मंडल, चानो मंडल सहित अन्य लोगों द्वारा उन पर हमला किया गया है तो इस आरोप पर तेज़ तर्रार वर्दी धारक द्वारा लिए एक्शन और सफलता को खबरों के माध्यम से पाठकों को जानने की जरूरत होगी न साहेब? 

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