* अमिता कमल, रेडियो उद्घोषिका, आकाशवाणी, ज्ञान वाणी एफएम
मानव सभ्यता ने प्राचीन काल से ही एक लम्बा सफर तय किया है। अगर हम भारतीय सभ्यता की बात करें तो इसे विश्व की प्राचीनतम सभ्यता में से एक माना जाता है। हमारे देश को अपने पारिवारिक व् सामाजिक व्यवस्था के लिए जाना जाता है। इस परिवार व्यवस्था के संचालन में नारी और पुरुष की समान भागीदारी है। पुरुष और नारी में शारीरिक और स्वभावगत अनेक भिन्नताएं हैं, एक कठोर है तो एक कोमल, पुरुष स्वभाव से अहंकारी है तो नारी त्याग करने वाली।
अगर हम इतिहास उठाकर देखें तो पहले महिलाओं को काफी अधिकार प्राप्त थे। नारियों की स्थिति काफी बेहतर थी। उन्हें स्वयंवर और शिक्षा का अधिकार था और वे युद्ध तक में भी पुरुषों के साथ जाया करती थी। मध्यकाल तक आते-आते विदेशी आक्रमण के कारण देश में महिलाओं की स्थिति चिंता जनक हो गई। उन्हें भोग की वस्तु समझा जाने लगा। नारियों के लिए युद्ध होने लगे, जिसके चलते पर्दा प्रथा, बाल विवाह, सती प्रथा जैसी कई कुप्रथाओं का जन्म हुआ।
स्वतंत्रता प्राप्ति तक महिलाओं की स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं था। फिर धीरे-धीरे अन्तर्राष्टीय और राष्ट्रीय महिला संगठनों ने महिलाओं की स्थिति मजबूत करने के लिए कई कार्य किये। जिससे महिलाओं की स्थिति में सुधार भी हुआ। परन्तु अभी स्थिति चिंताजनक है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर घंटे में 12 फीसदी महिलाएं बलात्कार का शिकार होती है और ऐसे भी कई मामले हैं जिसमें महिलाएं बदनामी की वजह से अपराध होने पर भी चुप रह जाती हैं।
पुरुषों के कुकर्मों से महिलाओं को सुरक्षित करने हेतु आईपीसी की कई धाराएं हैं पर इन सबके बावजूद अपराधों में और वृद्धि हुई है। हाल ही में कुछ मामलों में तो बच्चियों तक को निर्मम बलात्कार का शिकार बनाया गया। कानून अपनी जगह ठीक है पर वास्तव में जरुरत है लोगों की मानसिकता बदलने की। जब तक महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण नहीं बदलेगा तब तक महिलाओं की स्थिति नहीं बदलेगी। पुरुषत्व की सार्थकता महिलाओं को सुरक्षा और सम्मान देने में है। उनका शोषण तो कायरता है।
नारी वो शक्ति है जिसे नुकसान पहुंचे तो समाज शक्तिहीन हो जायेगा। महिला से सम्बंधित विषय पर पुरुषों को अधिक काम करना होगा। पुरुषों के हाथ में ही है महिलाओं को सम्मान देना। तभी कहा गया है नारी का सम्मान जहाँ है, संस्कृति का उत्थान वहाँ है। बस इस विचार को सार्थक बनाने की जरुरत है।



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