* कमल मैहरोत्रा
मोदी जी शब्दों के चनों से भाइयों और बहनों का मन भर आता है पेट नहीं भरा करता, कहीं लेनिन क्रांति १७१० का समय तो नहीं ? अनयथा सत्ता परिवर्तन सुनिश्चित है।
कैसी विडम्बना है डॉक्टर्स , पुलिस स्वयंसेवी संस्थाएं अनेकानेक परिवारों का त्याग और समर्पण विभिन्न कुछ परेशानियों के बीच इस अकल्पनीय भयावह स्वनिर्मित या स्वनियोजित रुपी रचना कितनी मार्मिक लाशों के ढेर पर प्रतीत हो रही है।
जो बाहें आलिंगन किया करती थीं उनमे स्पर्श का भय चन्द सत्ता और आर्थिक लोलुप प्राणिओं ने भिन्न-भिन्न माध्यमों से इतना भर दिया कि पुण्यें आत्माएं भी सिकुड़ी धरा पे प्रतीत हुई।
इसके साथ शुरू हुआ हमारे देश में कुछ करोड़ कन्धों पे एक नई अर्थ रूपी व्यवस्था का जन्म जो पुरानी व्यवस्था में मिश्रण के साथ नवनिर्मित है जिसका पहला रूप रुपए २,०००/- करोड़ के वेंटिलेटर हैं जिसकी सरकारी आंकड़ों के हिसाब से आवश्यकता मात्र चंद नंबर्स में भी की जा सकती थी।
देखा गया कि छोटे शहरों में भयावह स्थिति आने से पहले मरीजों को शहर क़े बड़े अस्पतालों में सुविधा अनुसार स्थानांतरित किया गया तो क्या आधे बजट में उपकरणों का व्यय नहीं किया जाना चाहिए।
आपकी धन व्यये प्रणाली पर काबिज महानुभावों से आग्रह है कि दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में नवीन उपकरणों का दुरूपयोग या न उपयोग वर्णन कई बार मीडिया द्वारा किया गया है। जिन प्रदेशों में कुशल शिक्षकों की कमी विद्यार्थिओं में पाई जा रही है। वहां ये स्वास्थ्य के नवीन उपकरण नगण्य हैं।
कई बार टीवी पर दिखाया गया जिससे साबित होता है कि अभी हमारे शहरों में ही नई तकनीक के मनमाने हिस्सेदार सुविधाओं के नाम पे जाल बिछाए बैठे हैं और पूर्ण रूप से सक्षम भी नहीं हैं।
मोदी जी आपकी क़ाबलियत तो तब है जब आप लोगों से पैसा किसी भी रूप में खींचने के बजाए इन हिस्सेदारों पर अंकुश लगा सकें, क्योंकि देखा गया कि आपने रूपए १२ प्रति व्यक्ति बैंक अकाउंट से बीमा के नाम पर चार्ज कर लिया मगर कोई भी बीमारी होने पर उसे सरकारी या गैरसरकारी अस्पताल ने नि:शुल्क सुविधा नहीं दी।
डगमगाते मजदूरों के क़दमों ने दर्शा दिया कि उद्योंगों के पहिए आसां नहीं इन मुट्ठी भर पूंजीपतियों के शोषण से चलाने।
औद्योगिक इकाईओं क़े पास मजदूरों क़े लिए चीन की तरह डोरमेट्री सुविधा देते हुए मजदूरों का पलायन रोकना चाहिए था। चीन की औद्योगिक नीतिओं के कारन ही वो विश्व विजेता बना हुआ है। हमारे पूँजीपतिओं में लिप्त सरकारों ने सिर्फ अपना पेट भरने की सोची।
मोदी जी की सूज भूज ने इस पूरानी व्यवस्था में इक नया रूप दिया और उनके अथक प्रयासों के बाद भी आर्थिक रूप से असहाये समाज की ओर आपका ध्यान सिर्फ ५ किलो गेहूं ओर २ किलो चने पे जाकर रुक गया, लेख के लेखक को अहसास हो गया कि पीड़ा सह रहे लोगों को इन २ चीजों के साथ सहयोगी वस्तुओं का वितरण अब सरकार द्वारा निकट भविष्य में होने वाले चुनावों तक स्थानांतरित तो नहीं हो गया?
मोदी जी हम शहरी लोगों को तो जीने की कला आती है, जरूरत उन परिवारों की बड़ी है जो हमें पाल रहे किसान हैं कहीं उनकी नाराजगी सत्ता का नशा न चूर चूर कर दें।
इन मार्मिक विचारों से आपके हृदयाघात के लिए छमा प्रार्थी हूँ। पूर्णतया कमल की कलम से

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