मैं कल मेरठ में प्रवेश कर चूका था। कोरोना के सामने सड़कों पर बेखौफ लोगों की तस्वीर एक के बाद एक दिख रही थी। खासकर ठेला चलाने वाले भैया को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें नहीं मालूम कि कोरोना का भी शहर में कहर है। उसी वक्त सड़क पर मैंने देखा कि साईकल पर पल्साटिक की बाल्टी लादे भैया भी बगैर फेस मास्क लगाए बेखौफ होकर अपना सेल्स का काम कर रहे हैं। मेरठ में एक के बाद बन रही दूसरी तस्वीर सामन्य दिख रही थी। सड़कों से गुजरने के दौरान मेरी नज़र माधव पुरम क्षेत्र के प्रवेश द्वार पर लगे बोर्ड पर गई और सबसे पहली तस्वीर जो जेहन में आई वो थी, कुछ वर्ष पहले शाम 6 बजे की कहानी।
मेरठ के वार्ड 48 को लेकर 28 जुलाई से 6 अगस्त, 2017 के एक साप्ताहिक अख़बार के लखनऊ एडिशन में हमने एक खबर पब्लिश की थी। उन दिनों मैं सुबह 10 से शाम के 5 बजे तक एक संस्थान में जॉब करता था, फिर शाम के 5 बजे से मेरठ के गलियों में खोजी खबरों के साथ रूबरू होता था।
29 जुलाई की वो शाम थी। मैंने अपने संस्थान के एक भैया को बोला आज शाम में मेरे साथ चलना है। 1 घंटे का काम है। आपको 50 रूपये मैं दूंगा। काम कुछ नहीं है बस मेरे साथ आपको खड़ा होना है सड़कों पर। मैं जिस संस्थान में जॉब करता था वो उसी संस्थान में सफाई का काम करते थे। कभी मेरे किसी काम को उन्होंने मना नहीं किया था। उस दिन भी वो बिलकुल तैयार थे। उन दिनों यह कहानी मेरे ज़िंदगी के सिर्फ 2-3 शख्स को ही मालूम थी कि मैं ऐसा कुछ कर रहा हूँ। मैंने 28 जुलाई से 6 अगस्त 2017 के उस साप्ताहिक अख़बार के लगभग 30/35 कॉपी लिए और वो भैया के साथ चल दिए मेरठ के माधव पुरम क्षेत्र में। वार्ड 48 के मेन गेट पर पहुंचा और जिस झोला में अख़बार की कॉपी थी उसे मैंने अपने साथी भैया को दे दिया। और मैंने अपने हाथों में 5/7 कॉपी रखकर सड़कों पर खड़ा हो गया और जो भी शख्स वहां से गुजरते मैं उन्हें रोकता और जिस खबर को मैंने उस क्षेत्र के संदर्भ में पब्लिश किया था उसके बारे में जानकारी देता और बोलता कि इसे पढ़ियेगा और कोई फीडबैक देना हो तो इस नंबर पर हमसे जरूर जुड़ियेगा।
यह काम मेरे लिए बहुत आसान था। मैं इस काम को दिल से कर रहा था। वहां से गुजरने वाले शख्स को जब मैं अख़बार देते हुए बोलता तो कोई कहता भाई चस्मा घर में रह गया है तो पढ़ नहीं पाउँगा तो उसे फ़ौरन जवाब देता कि घर ले जाइये और वहां इसे पढियेगा, आपके गली की ही खबर है। कुछ लोग अख़बार लेने से भी मना कर देते थे। निराशा भी हाथ लगती थी मगर उस रास्ते से जो लोग भी गुजरते हर किसी पर हमने कोशिश किया। हर किसी को खबर के बारे में जानकारी देना और फिर उस अख़बार को उन्हें देना उस शाम की हमारी प्राथमिकता थी।
एक शख्स ऐसा भी मिला जो उस क्षेत्र के पार्षद साहब के पारिवारिक शख्स था उन्होंने शालीनता से उस अख़बार की कॉपी को स्वीकार किया और बोला भी कि मैं पार्षद जी को भी इसकी कॉपी दूंगा। कई लोगों ने हमें अख़बार के पैसे देने की भी कोशिश किये, वो फ्री में लेना नहीं चाहते थे। इस तरह की प्रतिक्रिया ने हममें एक नई ऊर्जा का संचार किया था। उस अख़बार की कीमत तो बहुत थी मगर संपादक त्रिनाथ मिश्रा जी की एक ऐसी वो मुहीम थी जो मेरठ की जनता के सरोकार के सामने उसकी कीमत हम वसूलने असमर्थ्य थे।
यह सिलसिला 29 जुलाई 2017 की शाम की थी। उन दिनों सवाल के भी वही तल्ख़ तेवर थे। उस अख़बार के पन्नों में वहां के पार्षद से मेरे तेवर के साथ सवाल थे: 1. यदि आपने वार्ड में विकास कार्य किये हैं तो आपके वार्ड के अधिकतर जनता को शिकायत क्यों हैं? वे नाखुश क्यों हैं? 2. जनता तो जनता होती है, लोग परेशान हैं, इसलिए आपसे शिकायत है, उनकी समस्या क्यों नहीं सुनते? 3. आपके वार्ड में जगह-जगह कचरा फैला है, गंदगी से लोग परेशान हैं, लोगों का आरोप है, आप शिकायत पर भी नहीं सुनते, क्यों? 4. वार्ड में सड़के भी ख़राब है, सीवेज की भी समस्या है, कई जगह स्ट्रीट लाइट ख़राब है, आखिर क्यों? ये वो 4 सवाल थे जिस सवाल के जवाब को लेकर मैं उस शाम चौराहे पर खड़ा था। वहां की जनता को बता रहा था कि मैंने बेबाकी से इसकी प्रतिक्रिया ले ली है। अब आप पढ़िए। पत्रकारिता के नए रूप को समझिये।
मेरठ में मुझे बहुत कम लोग जानते थे, मगर मुझे याद है जब मैं अगली सप्ताह का जिक्र करता कि इस दिन मैं इस क्षेत्र में आपसे जुड़ूंगा तो लोगों की प्रतिक्रियाएं ऐसे मिलती थी जैसे एक बेहतर रिश्ता के उदहारण बन गया हूँ मैं और वो। वो सब लोग मुझसे अनजान थे। मैंने उन्हें कभी नहीं देखा था। मगर वो मेरे हर सवाल को सवाल समझते थे। हकीकत में एक शब्द भी मुझे उनकी मिल जाती थी तो मैं उसे उसी तेवर के साथ वहां के जिम्मेदार शख्स से उस मसले पर बातें करता था।
यह सब कुछ किसी सड़कों के चौराहे पर करना किसी सपने को देखने से बहुत दूर की तस्वीर थी। उन दिनों सफलता और पत्रकारिता से मुझे क्या मिलेगा ये सवाल की कोई औकात नहीं थी। और न ऐसे सवालों को अपने जेहन में कभी आने दूंगा।
मैंने यह भी तो नहीं सोचा था कि जिस 29 जुलाई 2017 की शाम को इस चौराहे पर अख़बार के कीमती पन्ने को फ्री में लोगों को दे रहा हूँ यह कुछ साल बाद जब शहर छोड़कर जाऊंगा तो कभी आया इस शहर में तो पहली याद बनेगी। एक ऐसी याद, जो शहर के तमाम बड़ी घटनाओं को एक झटके में समाप्त कर, तमाम घटनाओं पर राज करेगी। मेरे ज़िंदगी में ये जो कुछ भी हुआ इसे उस विकसित माहौल में बनना बहुत असाधारण घटना है। मैं इसे अब कभी नहीं भूलना चाहता हूँ। मैं अपनी यादों में इसे हमेशा संभालकर रखना चाहता हूँ।
मैंने नहीं सोचा था जब इस शहर में आऊंगा तो ये सब कुछ मुझे याद आएगी। संस्थान में वो सफाई वाले भैया बहुत साधारण इंसान, जिनसे मैं अपने दफ्तर में हर घंटे, दो घंटे पर बातें करता था, कभी कैंटीन से वह फ्रूटी लाने की बात करते तो कभी पेटीज, वो इंसान इस घटना में या कहूं कि इस पत्रकारिता के कहानी में इतने ऐतिहासिक भूमिका बनेंगे उन दिनों मुझे एहसास भी नहीं था। आज ये तस्वीर मेरे सामने ऐसे बनते जा रहे हैं जैसे ये बस एक दिन पहले की घटना है। मेरठ मेरे लाइफ की कवर पेज की तरह है। जब एक 'मेरठ' शब्द का जिक्र करता हूँ तो न जाने कितने पन्नों की कहानी एक कतार में सामने नज़र आती है। अगर सिकेन की कोई कहानी आपको मेरठ की धरती पर याद हो तो सिकेन चाहता है कि आज फिर से दो बातें हो, चलिए फिर करते हैं कमेंट बॉक्स में मुलाकात।

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