Monday, August 15, 2016

आजादी दिलाने में योगदान देने वाले भगत सिंह को भला कैसे भूला जा सकता- पूजा सिंह, नेशनल वॉइस

पूजा सिंह, नेशनल वॉइस
आज पूरा देश स्वतंत्रता दिवस के रंगों में रंगा हुआ है। हर कोई अपने अंदाज में आजादी का जश्न मना रहा है। इस कड़ी में आजादी दिलाने में योगदान देने वाले भगत सिंह को भला कैसे भूला जा सकता है।
भगत सिंह ने हमारे देश को आजाद कराने के लिए हंसते-हंसते अपने प्राण त्याग दिए। छोटी सी उम्र में उन्होंने ना सिर्फ अग्रेजों की दमनकारी नीतियों का विरोध किया बल्कि फांसी के फंदे पर लटकने के लिए भी आसानी से तैयार हो गए। उनकी इस देशभक्ति को देश सलाम करता है। भगत सिंह ने देश की आज़ादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया, वह आज के युवकों के लिए बहुत बड़ा आदर्श है।

जब देश अंग्रजों की दमनकारी नीतियों का सामना कर रहा था तब भगत सिंह ने उनके खिलाफ संघर्ष किया जिसके लिए उनको कई बार जेल भी जाना पड़ा लेकिन उनके इरादे बुलंद थे। जेल में बंद होकर भी उन्होंने देश को आजाद कराने के लिए अपना आंदोलन जारी रखा। जेल में रहते हुए उन्होंने अपनी लेखनी से अग्रेजों का विरोध किया। उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था मैं नास्तिक क्यों हूं?

भगत सिंह को इसलिए मिली फांसी ?

हम सभी जानते है कि भगत सिंह  को छोटी सी उम्र में फांसी के फंदे पर लटका दिया गया था। क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने वर्तमान नई दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार संसद भवन में 8 अप्रैल 1929 को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये बम और पर्चे फेंके थे। जिसके बाद उनदोनों को गिरफ्तार कर लिया गया। उसके बाद 23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फांसी दे दी गई। उनकी अंतिम इच्छा पूछे जाने पर उन्होंने बहुत ही सहज तरीके से कहा कि मेरी अंतिम इच्छा ये है कि मुझे लेनिन की पूरी जीवनी पढ़ने का समय दिया जाए। फांसी पर चढ़ने से पहले भगत सिंह और उनके साथी के लास्ट बोल कुछ यूं थे।

"मेरा रंग दे बसन्ती चोला, मेरा रंग दे
मेरा रंग दे बसन्ती चोला। माय रंग दे बसन्ती चोला
और हंसते हंसते दुनिया को अलविदा कह गए"

आंदोलन के डर से अंग्रेजों ने भगत सिंह और उनके साथी के साथ कुछ ऐसा किया?
चौंकाने वाली बात ये थी कि भगत सिंह और उनके साथी को फांसी पर लटकाने के बाद भी अंग्रेजों के ये डर सता रहा था कि कहीं उनकी मौत के बाद आंदोलन न भड़क जाए जिससे बचने के लिए उन्होंने भगत सिंह और उनके साथियों के शव के टुकड़े किए और बोरे में भर दिए। इसके बाद मिट्टी के तेल से इन टुकड़ों को जलाने लगे जिसे देखकर गांव के लोग वहां पहुंच गए। इसके बाद अंग्रेजों ने लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंक दिया। जब गाँव वाले पास आये तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो को एकत्रित कर विधिवत उनका दाह संस्कार किया।

भगत सिंह पर बनी कई फिल्में

आज भी भारत और पाकिस्तान की जनता भगत सिंह को आज़ादी के दीवाने के रूप में देखती है जिसने अपनी जिन्दगी देश के लिये समर्पित कर दी। उनके जीवन ने कई हिन्दी फ़िल्मों के चरित्रों को प्रेरित किया। कुछ फ़िल्में तो उनके नाम से बनाई गयीं जैसे - द लीज़ेंड ऑफ़ भगत सिंह। यह शहीद भगत सिंह के जीवन पर बनायी गयी अब तक की सर्वश्रेष्ठ प्रामाणिक फिल्म मानी जाती है


(Story written by Pooja Singh, Journalist National Voice)

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