मैं नेता होता तो किसी अख़बार में खबर छपी होती 'स्वतंत्रता दिवस पर स्वतंत्र युवा पत्रकार सिकेन शेखर बाजपेयी का तोहफा, दांगी छात्रावास में आज़ादी के जश्न में मौजूद छात्रों के प्रोत्साहन हेतु दिया वित्तीय सहायता। मगर नहीं, यह सब होना बकवास है या बस प्रचार मात्र है। खबर छपने के बाद जो बधाइयाँ या शुभकामनायें मिलती हैं उससे अपने दिमाग पर कुछ असर नहीं होता। और भूले भटके आप पूछते हैं कि कुछ असर तो होगा तो मुझे गोलम्बर की याद आती है। यह कोई कहानी नहीं है फिर भी पढ़ी जा सकती है। आप कभी गोलम्बर का चक्कर लगाएं होंगे। जितनी मर्जी चक्कर लगाते रहिये, अगर आप चाहें तो कभी सफर रुकने वाली नहीं। गोलम्बर बेशक 50 मीटर ही सही मगर आप चाहें तो हज़ारों मीटर की यात्रा गोल गोल घूम कर ही पूरा कर लेंगे। एक दिशा और एक ही स्थान से बार बार गुजरने जैसी स्थिति के सामने कुछ और मुझे तो नज़र नहीं आता। इस स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण सवाल होता है कि क्या आप आगे बढ़ रहे हैं? तो इसका जवाब होगा नहीं। आप रुक गए हैं।
इसीलिए आप देखें होंगे मोदी जी बेहतर कार्य करने के बाद कमेंट बॉक्स से दूर रहते हैं। उनके चाहने वाले उन्हें नमन से प्रणाम और चन्दन-वंदन से अभिनन्दन तक करते हैं, मगर इतना मान कर चलते हैं कि लोगों द्वारा बधाइयाँ या शुभकामनायें देना, ये सब सामान्य घटना अक्सर होगी ही। ये सब सामान्य सी बातें हैं। आज के दौर में लोग किसी को कॉल कर बेशक दो शब्द न कहें, पर फेसबुक से व्हाट्सप्प पर मैसेज और कमेंट में सो प्राउड, नेक कार्य, बहुत बहुत बधाई, सलूट आदि शब्दों से आप पर फूल बरसाये जाते हैं। सामान्य सी बातें हैं। हर किसी को अच्छा लगता है और लगने भी चाहिए।
किसी द्वारा किये ऐसे कार्यों को नज़र में रखना अहम् है। वैसे लोगों को बच्चों के करीब रखना भी अहम है ताकि बच्चों को भी एक तस्वीर नज़र आनी चाहिए कि मेरे लिए कोई खड़ा हो सकता है। मगर इन सभी स्थिति के सामने प्रोत्साहन हेतु वित्तीय सहायता जिन बच्चों को मिली है उन बच्चों को जानना सबसे अहम है। क्योंकि छात्रों के लिए छात्रवृत्ति का उद्देश्य, छात्रवृत्ति मिलने के बाद उस पैसे से छात्रों के जीवन में जुटाए जाने वाले महत्वपूर्ण संसाधन या उस पैसे से अर्जित किये हुए ज्ञान से आये परिणाम आदि बातें भी मायने रखती है। इसके सामने बधाइयाँ और शुभकामनायें की हैसियत छोटी पड़ने लगती है और मुझे लगता है कि इन बच्चों से आपको भी रू-ब-रू होना अहम है जिन्हें 74वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर वित्तीय सहायता दी गई है ताकि आने वाले वक्त में इन के द्वारा किये जाने वाले हर एक गतिविधि पर हम सब की निगाहें टिकी रहे और बच्चे भी बेहतर कार्य और परिणाम हेतु अपने मकसद को पूरा करने में जी जान लगाते रहे।
तो चलिए इसी क्रम में मिलते हैं वीर विक्की दांगी, रितिक रौशन दांगी, सोनू कुमार दांगी और अंकित कुमार दांगी से जिन्होंने कोरोना काल में देश भक्ति की भावना को बनाये रखने के लिए दांगी छात्रावास हाजीपुर में अखिल भारतीय दांगी क्षत्रिय संघ वैशाली द्वारा आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह में उपस्थित नज़र आये और आयोजन के वक्त कई क्रियाकलापों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।
वीर विक्की दांगी, उम्र 25 वर्ष, पिता जी का नाम श्री मिथलेश सिंह दांगी। वीर विक्की दांगी वैशाली जिला के श्यामपुर दयाल गाँव से हैं। इन दिनों अखिल भारतीय दांगी क्षत्रिय संघ वैशाली द्वारा संचालित दांगी छात्रावास हाजीपुर में रह कर एनटीपीसी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं और आगे चलकर वह अपनी ज़िंदगी में एक अच्छी नौकरी कर के अपने परिवार, समाज व् देश की सेवा करना चाहते हैं। 74वें स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान मिली वित्तीय सहायता की रकम का इस्तेमाल अपने ट्यूशन फी, किताब-काॅपी आदि आवश्यक चीजों में करना चाहते हैं। वीर विक्की दांगी का करियर के समक्ष उत्पन्न हो रहे बाधा को लेकर कहना है कि कभी-कभी आर्थिक कमी आ जाती है। वित्तीय सहायता की राशि मिलने पर वह बहुत खुशी महसूस कर रहे हैं और इससे वह अपने सपने को पूरा करेंगे।
रितिक रौशन दांगी, उम्र 18 वर्ष, पिता जी का नाम श्री दीप नारायण सिंह। रितिक वैशाली जिला के अररि गाँव से हैं। इनके पिता जी गाँव में ही मशीन बनाने का काम करते हैं। मशीन बनाने वाले लोगों की कीमत शहर में इंजीनियर जैसी होती है मगर गाँव में ऐसे शख्सियत बहुत सामान्य मानवी के होते हैं। रितिक रौशन दांगी इन दिनों दांगी छात्रावास हाजीपुर में रह कर जेनरल कॉम्पटिशन की तैयारी पर अपनी नज़र बनाये हुए हैं। मकसद नौकरी पाकर राष्ट्रहित में अपनी योगदान देना है। करियर को उड़ान देने में रितिक रौशन दांगी को कभी कभी आर्थिक स्थिति से लड़ना पड़ता है ऐसे में वित्तीय सहायता के रूप में मिली राशि को पाकर बेहद खुशी महसूस कर रहे हैं और इस राशि को अपने अध्ययन के कार्यों में खर्च कर अपने बुलंद हौसलों से सपनों की मंजिल पाना चाहते हैं।
सोनु कूमार दांगी, उम्र 21 वर्ष, पिता जी का नाम श्री शत्रुघ्न सिंह। सोनु कूमार दांगी सारण जिला के डुमरी बुजुर्ग गाँव से हैं। इन दिनों अखिल भारतीय दांगी क्षत्रिय संघ वैशाली द्वारा संचालित दांगी छात्रावास हाजीपुर में रह कर रेलवे व् एसएससी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं और आगे चलकर वह ऑफिसियल नौकरी के साथ व्यवसाय करना चाहते हैं। 74वें स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान मिली वित्तीय सहायता की रकम का इस्तेमाल शिक्षा सम्बंधित कार्यों में करना चाहते हैं। सोनु कूमार दांगी का करियर में बाधा को लेकर कहना है कि वह इन दिनों आर्थिक तंगी के साथ मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं। छात्रवृत्ति पाकर वह बहुत खुशी महसूस कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने इस योगदान के लिए आभार भी व्यक्त किया है।
अंकित कुमार दांगी, उम्र 17 वर्ष, पिता जी का नाम श्री सनंत कुमार सिंह। अंकित वैशाली जिला के मधुरापुर गाँव से हैं। अंकित कुमार दांगी इन दिनों दांगी छात्रावास हाजीपुर में रह कर भारतीय सैन्य सेवा में प्रवेश हेतु तैयारी कर रहे हैं। मकसद एक तेज तर्रार अधिकारी बनकर राष्ट्र की सेवा करना है। छात्रवृत्ति की राशि पाकर अत्यंत खुश हैं और इस राशि को अपने शिक्षा के कार्यों में इस्तेमाल करना चाहते हैं।
तो ये तमाम कहानी उन बच्चों की है जो इन दिनों मेहनत से अपनी ज़िंदगी की कश्ती बना रहे हैं। मैंने इन बच्चों को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर एक वर्ष के लिए जेनरल कॉम्पटिशन की तैयारी हेतु छात्रवृति के रूप में बहुत ही सामान्य सा रकम दिया है लेकिन आगे इस समय अवधि में ये अपनी सफलता नहीं पाते हैं तो उनकी करियर सम्बंधित खर्च उठाने के लिए तैयार नज़र आऊंगा। और साथ ही दांगी समाज के साथ अन्य बच्चे जो आर्थिक तंगी के सामने अपने मकसद को पाने में जंग लड़ रहे हैं उन्हें भी अपनी मेहनत से हासिल किये एक एक पाई से मदद करूंगा।
आप सभी बच्चों से बस एक बात कहना है, दिन रात एक करके मेहनत कीजिये, अपने उन सभी कार्यों से मोहब्बत कीजिये जिससे आपकी पहचान विकसित हो। इस देश में कोई सिर्फ आईएएस और नेता बनकर ही नाम और पहचान बना ले ऐसा अब वक्त नहीं। अपने रुचि के हिसाब से अपने कार्यों का चयन कीजिये और जमकर मेहनत कीजिये। आज़ादी के क्रांतिवीरों को याद कीजिये, जिन्होंने इस वतन को हमारे हवाले किये। उनके सोच-समझ और जुनून को समझिये। यह देश तो झाड़ू लेकर कैमरा के सामने आने वाले को भी हीरो बना देता है और जिसने कभी चौकीदारी नहीं की उसे भी। मुझे यकीन है आप ऐसी कोई हरकत नहीं करेंगे। ऐसा नहीं है कि गांधी के दौर में सफाई का महत्व और स्वच्छता के सामने टेक्नोलॉजी ही सहारा था, मगर आज उसी नेतागिरी को पाने में नालायकी के सामने विचारधारा का होना चुनौती है।
आप सभी लोग इन बातों को गंभीरता से मत लीजिये, मस्त रहिये। हर एक काम जो छोटे छोटे हैं उन्हें नए रूप से करके, नए अंदाज में करके अपनी दक्षता का परिचय दीजिये। आपके सामने हर खुशियां एक सितारा का अनुभूति कराएगा। एक शख्सियत का अनुभूति कराएगा और याद रखियेगा जब जिस दिन या रात आप अपने करियर के सामने कमजोर पड़िएगा आपका सिकेन आपके लिए खड़ा नज़र आएगा। जय हिन्द।
- सिकेन शेखर बाजपेयी


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