इस देश में आज़ादी के रंग और तीन रंगों से बना ध्वज के सामने आन बान और शान की धज्जियां कैसे उड़ती है उसकी इस तस्वीर को आपको समझना होगा। यह देश या तो पुलिसिया तंत्र के साथ गुंडों का जन्म लेने का एक प्लेटफॉर्म बन गया है या इन गुंडों के सामने पुलिसिया तंत्र का चलने का एक सिस्टम। इस अंतर और मंत्र को जरा समझिये।
आज बातें सिर्फ दो टूक में होगी। आज बेशक मैं एक खबर का उदाहरण ले रहा हूँ मगर मेरे नज़र में पत्रकारिता की यहां चिता जल रही है। आज जलना भी जरुरी है। क्योंकि हर रोज एक नई, बेहूदा जैसी हमारे सामने कहानी है और उसी कहानी से हम सबक लेने के जुगाड़ में बैठे हैं। बिहार की धरती से हम पत्रकारों के सवाल आज बहुत कम पड़ गए हैं। कहानी से कानून और कानून से सुरक्षा, सुरक्षा से देश और देश से विदेश। विदेश इसलिए, क्योंकि आप सभी पीएम मोदी के आने के बाद विदेश में देश का झंडा कितना बुलंद है उससे अपनी देश की तरक्की का अनुमान लगाते हैं और जश्न मनाते हैं।
आज चाहूंगा कि बिहार में वर्दी धारण किये एक एक पुलिस अधिकारी को यह आवाज सुनाई देनी चाहिए। मुझे न तो बिहार के सबसे टॉप चेयर पर बैठा पुलिस अधिकारी पर भरोसा है न सबसे ग्राउंड पर वर्दी में खड़ा उस शख्स पर। आज बिहार में इन सबकी पहचान खत्म हो गई है और इस नजरिया को अब आपको समझना है।
समाचार के पन्नों से जरूर इस खबर को लिया हूँ मगर आज बात इससे बाद की नहीं, बल्कि बात इससे पहले के हालात में जाकर करेंगे। बिहार के जिले में तैनात पुलिस अधिकारी कैसे उसी क्षेत्र में जान और अनजान गुंडों के साथ कुछ दुरी पर अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं? यह मेरे समझ से परे है। इस देश के जिले में क्या यह संभव नहीं कि जिले के क्षेत्र में या तो गुंडा रहे या पुलिस? सोचिये जरा...
अब आते हैं शुरूआती दौर में, क्या यह भी संभव नहीं कि तैनाती के वक्त तेज़ तर्रार पुलिस ऑफ़िसर जब जिला में दस्तक दें तो हर एक गुंडे को अपने दफ्तर बुलाकर उसे ठीक ठाक इलाज कर दें? कह दीजिये कि यह भी संभव नहीं। क्या यह भी संभव नहीं कि जिले के हर एक चौक चौराहे पर, हर रोज माइक और भोपू के साथ पुलिस आवाज लगाए कि हम सभी गुंडे की तलाश में हैं जिसकी शक्ल समाज में रह रहे आम लोगों को तंग करना और परेशान करना है उसकी सूचना हमें इसी वक्त दें? कह दीजिये, आम जनता तक इतनी पहुंच भी संभव नहीं।
क्या यह भी संभव नहीं कि आईपीएस जैसे अधिकारी जिला में जब आते हैं तो हर एक गुंडे की चमड़ी उधेड़ने की हिम्मत नहीं होती? कह दीजिये नहीं होती। मतलब 'संभव नहीं है' तो यह एक पक्ष है और अगर ऐसा नहीं है तो दूसरे पक्ष में सिकेन की निगाहें जाये उससे पहले सफेद वर्दी वाले जो नेता लोगों के लिए वोटिंग कराने की प्रक्रिया का पालन जो करते हैं खाकी वर्दी वाले, जरा इनकी भी कभी वोटिंग करवा लीजिये कि आखिर जिस शहर में, जिस क्षेत्र में पुलिस वाले लोग ड्यूटी पर तैनात हैं उनकी वास्तविक स्थिति गुंडों के सफाया करने में क्या है?
एक आईपीएस कितना एक्टिव है समाज में बिल्डिंग से लेकर झोपड़ी में रहने वाले गुंडों तक अपनी पहुंच बनाने में? कितना फ़ास्ट इन लोगों की अप्रोच है हर दिन वर्षों से अन्याय कर रहे है गुंडों के गतिविधि को रोकने में? आखिर वास्तविक स्थिति को दरकिनार करके समाज में कैसे कोई गुंडा अपनी रोटी सेक कर पेट भर ले रहा है पुलिसिया ड्यूटी के सामने? एक बड़ा सवाल है जो एक पक्ष के तरफ से है।
अब आते हैं दूसरे पक्ष की ओर और सिर्फ एक शब्द में कहूंगा 'यह सब संभव है' ड्यूटी के सामने। और यही संभव की तस्वीर आज से बीस या बाइस दिन पूर्व नेवालाल गिरी जब अपने पत्नी रिंकू देवी को छत से नीचे फेंक दिया था तब पुलिस अगर एक्टिव होती तो ऐसे बेशर्म लोगों को उसी समय सबक सिखाया जा सकता था।
हर मौके पर पुलिस अपनी ड्यूटी कर रही है और गुंडे गुंडागर्दी, तो इस अंतर पर वर्दी वाले लोग या तो सामने आइये, नहीं तो काम करना बेकार है। अफ़सोस के सिवा और क्या है यहां? अवसर स्वतंत्रता दिवस, मौत का टर्न बना जलेबी। यह सब कुछ हुआ आजादी के 73 वर्ष पर। जब देश में तिरंगा आन बान और शान से आसमान की ऊंचाइयों में लहरा रहा था। वैशाली आज बदनाम है। गुंडों और मवालियों का भी अब गढ़ है। जय हिन्द।
सिकेन शेखर बाजपेयी।

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Jai hind ...
Siken ji
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