जरा उस दौर को याद कीजिये जब गांधी जी ने ग्रामसभा से लोकसभा तक के लोकतांत्रिक ढांचे की कल्पना की थी और कहा था कि ‘आजादी नीचे से शुरू होनी चाहिए। हर एक गांव के लोगों की हुकूमत या पंचायत का राज होगा। उनके पास पूरी सत्ता और ताकत होगी। इसका मतलब यह है कि हर एक गांव को अपने पांव पर खड़ा होना होगा। अपनी जरूरतें खुद पूरी कर लेनी होंगी ताकि वह अपना कारोबार खुद चला सके।
सच्चे प्रजातंत्र में नीचे से नीचे और ऊंचे से ऊंचे आदमी को समान अवसर मिलने चाहिए। इसलिए सच्ची लोकशाही केंद्र में बैठे हुए दस-बीस आदमी नहीं चला सकते, वह तो नीचे से हरेक गांव के लोगों द्वारा चलाई जानी चाहिए।’ इस दृष्टि से बापू ग्राम पंचायतों के विकास के लिए बहुत उत्सुक थे। उन्होंने कई बार यह बात कही थी कि ‘भारत अपने चंद शहरों में नहीं बल्कि सात लाख गांवों में बसा हुआ है।’ इन आंकड़ों के साथ अगर बिहार पर नज़र डाले तो बिहार में लगभग 45 हज़ार 100 गांव है। मगर इन गांवों में राष्ट्रीय संस्कृति और समृद्धि की तस्वीर इन दिनों किस हाल में है? यह बड़ा सवाल है।
बापू के दौर में अगर कदम रखें तो आपको याद आएगा कि बापू उस वक्त जिस राष्ट्रीय निर्माण की कल्पना किये थे उस राष्ट्रीय निर्माण में मुख्य रूप से गांवों का स्वशासित, आत्मनिर्भर, सहयोगात्मक, सामुदायिक जीवन जीने जैसा माहौल का निर्माण करना था और ऐसे परिणाम के ठीक सामने गांव के एक एक शख्स को अपनी कुशलता, सतत प्रयत्न व् आर्थिक दृष्टि से मूल्यवान वस्तु का निर्माण करना अहम है और ऐसा होता है तो उसे स्वाभिमान, आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता, साहस, आशा, स्वतंत्र सूझ-बूझ और शक्ति प्राप्त होती है।
उसके बाद वह अधिक कठिन काम, ऐसा काम जिसमें दूसरों के साथ मिलकर करना पड़े, करने के लिए भी तत्पर हो जाता है। अगर उसके साथ दूसरे भी ऐसा ही करते हैं तो उन सबमें सामूहिक साहस और सामूहिक आशा का संचार होता है।
जरा याद कर लीजिये स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारत के किसान गांधी जी के कार्यक्रम की प्रेरणा और पथ-प्रदर्शन से अपने ही सादे औजारों से ऐसी चीजें बनाते रहे, जिसका बड़ा और सकारात्मक परिणाम हम खादी की आश्चर्यजनक प्रगति के रूप में आज तक देख रहे हैं। तो चलिए फिर हम एक साथ मिलकर लिखते हैं मिशन ‘गदाई सराय’ ‘एक नया संघर्ष’ की पटकथा को।
सिकेन शेखर बाजपेयी


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