राजनीति चाहे जैसी भी हो मगर आज के दौर में गंदा खेल से लेकर दिलचस्प गेम तक की स्थिति बनती दिख रही है। एक पार्टी कहीं करवट ले तो विकास मकसद होता है और कहीं बेवफ़ा हो तो डेवलपमेंट मकसद होता है। दोनों स्थिति और परिस्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ता। मगर जनता सामने होती है और हर स्थिति में जनता पर इसका गहरा असर पड़ता है तो फर्क पड़ता है।
जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने सोमवार को यहां प्रगतिशील लोकतांत्रिक गठबंधन यानी पीडीए बनाने की घोषणा की। इस गठबंधन में चंद्रशेखर आजाद की अध्यक्षता वाली आजाद समाज पार्टी, एमके फैजी के नेतृत्व वाली सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी यानी एसटीपीआई और बीपीएल मातंग की बहुजन मुक्ति पार्टी शामिल हुई है।
यहां मकसद विकास बाद में है पहले यह गठबंधन 30 साल के महापाप को समाप्त करने के लिए बनाया गया है। मतलब अस्पष्ट है आरजेडी और एनडीए पर निशाना पीडीए का होगा और पीडीए में आरजेडी का तभी स्वागत होगा जब आरजेडी को मुख्यमंत्री का सपना छोड़कर राजनीत और सत्ता मकसद के तौर पर लेकर चलना होगा। राजनीत का यह गहरा अध्याय है। आगे चलकर पीडीए और आरजेडी भी एक साथ नज़र आएगी। इंतज़ार कीजियेगा।
मगर इन स्थिति के बीच जरा एनडीए के पन्ने को पलटिये, याद आएगा कि मई 1998 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की घोषणा हुई थी जो उस समय गैर काँग्रेसी सरकार के गठन के निर्माण में पहला कदम था लेकिन एक वर्ष के भीतर ही ढह गया क्योंकि आल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने अपना समर्थन वापस ले लिया था। इसे और विस्तृत करने के लिये कुछ नये दलों के साथ मिलकर 1999 का लोकसभा चुनाव जीतने का नये सिरे से प्रयास किया गया। इसके परिणाम बेहतर निकले और राजग को पूरे पाँच साल के लिये प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी साहब को सत्ता चलाने का अवसर मिला। साहब ने अपना कार्यकाल बेहतर ढँग से पूरा भी किया। लेकिन जरा समझिये 1998 से शुरू सिलसिला 2014 और 2019 में क्या गजब ऐतिहासिक टर्न नेताओं को दिया। यह सब कुछ सामान्य है। जनता गेम चेंजर है। स्वाद ही पर्याप्त है। तभी तो चाय की चुस्की के सामने सब ढहता चला गया। कांग्रेस की हवा कैसे निकली राहुल भी समझने के काबिल नहीं रहे।
मगर इसके ठीक सामने 2020 में पप्पू यादव गठबंधन का ऐलान करते हुए इसे मानवतावादी और सब को लेकर चलने वाला गठबंधन बताया है। उन्होंने कहा कि उनकी बात राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा से भी हो रही है, उनका भी इस गठबंधन में स्वागत है। दो दिनों में इस गठबंधन में और पार्टियां शामिल होंगी। उन्होंने लोजपा और कांग्रेस को भी इस गठबंधन में शामिल होने की दावत भी दी है। तो क्या इसे एक रणनीति के आगे का एक हिस्सा कह लें जिसमें आरजेडी भी साथ साथ नज़र आएगी? तो इसका जवाब भी 'हाँ' समझ लीजिये। क्योंकि एनडीए सामने है जिसमें मोदी चेहरा हमेशा और हर हाल में बगैर बयार का लहरा रहा है। चाहे जैसी भी देश की स्थिति हो। इस देश में मौजूदा दौर को देखते हुए जात धर्म ही एक मात्र विकल्प है जिसके जरिये एनडीए में सेंध लगाना विकल्प है।
अगर आप सोचते हैं कि रोजगार, विकास और नंबर वन बिहार ये सब मुद्दा है तो यह सच है मगर वोट जीतने का न बिहार में कल विकल्प था न आज 2020 में विकल्प है।
पप्पू यादव ने दो दिनों के बाद कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बनाने की भी घोषणा की है। इस अवसर पर उन्होंने एनडीए और महागठबंधन दोनों को निशाना बनाते हुए कहा कि 30 साल का यह महापाप अब खत्म होना चाहिए। पप्पू यादव ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने कोरोना वायरस और लॉकडाउन के दौरान गुजरात और दिल्ली में लाचार बिहारियों की मदद नहीं की। तो खैर, आगे के दौर में निगाहें जरुरी है। आप भी इस दिलचस्प चुनाव पर नज़र बनाये रखियेगा। जय हिन्द।
सिकेन शेखर बाजपेयी

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