उफ्फ, ये उम्र ! अगर ये मेरे हाथ में होता तो मैं इसे 19 वर्ष पर ही रोक लिया होता! हमेशा दिल में एक कोशिश थी कम उम्र में कुछ बड़ा करो और बड़ा करने के लिए अच्छी शिक्षा के साथ जमकर मेहनत। मगर शुरू से ही मैं इन्डिसप्लिन स्टूडेंट रहा हूँ। हमेशा भीड़ से अलग रहना चाहा। सौ की भीड़ हो या हज़ार हमेशा खुद की कतार में खुद को अकेला देखने की सोच आज 26 पर ले आया।
आज डॉ. किरण बेदी जी की बात मेरे जहन में लगातार चल रही है। उनसे मेरी पहली मुलाकात दिल्ली में हुई थी और तब से आज तक उनकी कही बात को हमेशा पूरा करने की कोशिश में पागलपन न जाने कितनी बार किया।
उन्होंने मुझे एक छोटा सा लक्ष्य दिया था और वह लक्ष्य था अपने लाइफ में एक ऐसा काम करो जिससे तीन या चार किसी शख्स को काम पर लगाया जा सके। आपमें से बहुत से लोग मेरे बारे में जानते हैं इस कोशिश मैं कितनी बार मूर्ख बना हूँ।
किसी को कुछ काम शुरू कराने के लिए कोई तैयारी करो तो कहां से कहां तक की कहानी बन जाती थी। खैर, सब को माफ़ किया और 26 के इस पड़ाव पर यह भी कोशिश डॉ. किरण बेदी जी की याद में अपने नाम कर लिया हूँ।
आगे की रणनीति में 27-28 की गिनती रुकने वाली तो है नहीं है। अगर आपके पास कोई फॉर्मूला हो तो जरूर बताइयेगा। सचमुच खुद की उम्र बढ़ते देखना सबसे बेकार अनुभव मुझे महसूस होता है। मैं अपने हर वर्षगांठ पर इस बात का जिक्र करता ही हूँ। 26 वर्ष की आयु में मैंने गिनती से सिर्फ 3 बार अपने जन्मदिन के सेलिब्रेशन का ग्रैंड रूप देखा है। मुझे बहुत ही खूबसूरती से वो हर लम्हा याद है।
इंडियन फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट के मंच पर पहली बार इस खूबसूरत दिन को देखा तो दूसरी बार इंडियाज सुपर टैलेंट के मंच पर ब्रावुरा रिसोर्ट में और तीसरी और आखरी बार रिपब्लिकन न्यूज़ के मंच पर। वैसे एक सच बताऊं तो इस बार मुझे मुंबई में ताज महल पैलेस के गोल्डन ड्रैगन में इस मोमेंट को जीने की कोशिश थी मगर कोरोना की वजह से एक के बाद एक कई कार्यक्रम रद्द हुए और इस कार्यक्रम को भी मुझे रद्द करना पड़ा।
जर्नलिज्म में आने के बाद सबसे बड़ा सवाल, बेशक सवाल छोटा हो मेरे पत्रकार बंधू लोगों को कहने की आदत लग जाती है और बिल्कुल ये आदत मुझे भी लगी हुई है तो ऐसे यहां एक सवाल कि अपने ज़िंदगी के सबसे खास दिन को आप कैसे जीना चाहते हैं? कुछ लोगों से मिलिएगा तो वह आज के माहौल में मेरे जगह 26 पेड़ लगाकर इस दिन को खूबसूरत बनाएंगे।
कुछ लोग केक-वेक और पार्टी। कुछ लोग न्यू प्लेस पर जमकर मस्ती। कुछ लोग गरीब लोगों के बीच जाकर उन्हें खाना खिलाने से लेकर कपड़े बांटने तक का काम करते हैं। और न जाने ऐसे कितने नए नए उदहारण हम सभी के पास अकसर होता ही है। आशीर्वाद प्राप्त करने का यह सब फॉर्मूला फिट है।
मोदी जी को देखिये तो वह भी बहुत ही खूबसूरती से मां जी से मिलकर आशीर्वाद लेते हैं। लेकिन यह सब करने के बाद क्या वाकई एक जिंदगी स्पेशल हो जाती है? क्या वाकई यह सब आपको औरों दिनों से अलग एहसास करा पाती है? यह एक बड़ा सवाल है। यहां पर एक सवाल, आपके नज़र में, आपके ज़िंदगी में सबसे खूबसूरत पल कब होता है? जरा सोचिये और मुझे मेरे ईमेल <siken.shekhar@gmail.com> पर जरूर शेयर कीजियेगा।
अब आते हैं काम की बात पर। आज आप लोग भी सिकेन को हैप्पी बर्थडे 'दो शब्द' बोलियेगा। बदले में सिकेन भी शुक्रिया, धन्यवाद कहकर आपके आशीर्वाद और प्यार को महसूस करेगा। मेरे जहन में यह सब बहुत सामान्य सी बात है।
जिस लोकतंत्र में मोदी जी सबसे महान हैं। जन्मदिन पर आशीर्वाद के साथ हर जश्न में उन्हें सुख प्राप्त है मगर उस लोकत्रंत, जिसमें आम जनता तंत्र का ही गुलाम है तो फिर उस आशीर्वाद का क्या? अगर यह एक वस्तु के रूप में मेरे पास होता तो सबसे पहले कीचड़ में फेंकना मैं पसंद करता।
जिस देश में हमने भगत सिंह को इंक़लाब ज़िन्दाबाद बोलते पाया। वही इंक़लाब ज़िन्दाबाद जिसका अर्थ है 'क्रांति की जय हो', जिस देश में गांधी को 'हे राम' बोलते सुना, उस देश की किस्मत किस मोड़ पर है? और इस देश को ऐसे मोड़ पर किस आशीर्वाद की जरुरत है? और इस देश का अगर एक हिस्सा का एक भाग का एक शख्स अगर सिकेन है तो फिर ये आशीर्वाद किस रूप आप लोग देना चाहते हैं? कभी सोचे हैं?
एक तरफ रिपब्लिक भारत वाला जो हीरो है वह हर शाम हाथ जोड़कर आपको प्रणाम-सलाम करता है। हिन्दू और सनातन के नाम पर सबसे ज्यादा सुर्ख़ियों में पाता है तो वह शख्स इस देश को क्या परोस रहा है? इस देश में अर्नब जैसे आशीर्वाद प्राप्त हीरो को सौ दिन तक न्याय-न्याय कहकर चिल्लाना पड़ेगा? और आप लोग आशीर्वाद और समर्थन देने वाले कतार के हीरो हैं। दूसरी तरफ मोदी जी भी नेतृत्व के चोटी पर हैं तब इस देश का ये हाल है। ऐसे में इस आशीर्वाद की कोई जरूरत मुझे नहीं लगती।
आज अगर मैं हिन्दू या मुस्लिम कहकर चिल्लाना शुरू कर दूँ तो दोनों तरफ से एक सामान ही आशीर्वाद मिलने शुरू हो जायेंगे। इस देश में मोदी बनना या अर्नब, बहुत आसान हो गया है। पैसा और गन्दी राजनीत दो सामान्य सी चीज है। किसी को मोदी बनने के लिए न तो चाय बेचकर संघर्ष करने की जरुरत है न अर्नब बनने के लिए किसी अच्छे संस्थान से मीडिया की पढ़ाई करने की। तो ऐसे में बड़ा सवाल यह कि राजनीत में कैसे लोगों की जरुरत है? और पत्रकारिता में कैसे लोगों की? इस पर जरा सोचिये? और आप लोगों के पास अगर पवित्र आशीर्वाद हो तो बचाकर रखिये कभी कोई मिले तो उसे दे दीजियेगा।
सिकेन जिस रह पर चल रहा है उस राह पर सचमुच आपकी भागीदारी की जरुरत है। अब तक पत्रकारिता को सीखता आया हूँ। अभी कुछ वक्त मुझे और चाहिए। आने वाले दिनों में एक-दो शो की तैयारी कर रहा हूँ। लास्ट मैन और लीडरशिप बियॉन्ड पॉलिटिक्स के जरिये कुछ अपने अनुभव को आपके बीच शेयर करने की कोशिश में लगा हूँ। इसके साथ इसी वर्ष बॉलीवुड में भी अपनी कदम डालने की तैयारी में हूँ। टेलीविज़न और फिल्म की स्टडी ने मुझे हमेशा स्टोरी मेकर कम स्टोरी टेलर ज्यादा बनाया मगर स्टोरी रीडर के जाल में मैं हमेशा फंसता रहा। मगर मैंने भी कमर कस लिया है। निकलना है और आगे बढ़ना है।
मोदी-शाह और योगी के जाल में आपलोग भी बर्बाद हो जाइएगा। आपका बच्चा भी बर्बाद हो जायेगा। इस देश के पास जो व्यवस्था है उससे आपको दूर रखने की कोशिश हमेशा की जा रही है। भारत पर विदेशी कर्ज मार्च 2019 तक 543 अरब डॉलर था। अरब डॉलर का मतलब आप अच्छा निकालते हैं। जरा मोदी जी की भाषण टीवी पर बंद करके गुणा भाग कर लीजियेगा। मार्च 2018 के मुकाबले विदेशी कर्ज की राशि में करीब 13.7 फीसद अरब डॉलर का कर्ज बढ़ा है। मोदी जी सिर्फ आपको सुविधा देने के नाम पर विदेश से कर्ज ले रहे हैं। आपके शहर में कभी भाषण देने यह साहब आये तो मुखिया सरपंच के साथ इस आदमी को बैठाइये खटिया पर। इनसे पूछिए कि इतना हीरो आप क्यों बन रहे हैं? आप आज तक के सबसे चर्चित नेता हैं न? तो देश को कितना डुबाइयेगा? और अगर आप इस स्थिति से देश को बाहर नहीं निकालने की क्षमता रखते हैं तो देश के प्रधानमंत्री का कुर्सी अभी छोड़िये और संघ को मजबूत कीजिये। आपकी बस की नहीं है।
इस देश के हिसाब किताब के बारे में कुछ सोचिये आप लोग भी? आज ज्यादा बातें नहीं बस इतना कहूंगा कि देश के कर्ज पर इस वक्त अर्नब से लेकर रवीश जी को एजेंडा चलाने की जरुरत है और मोदी से लेकर राहुल जी को राजनीत करने की जरूरत है।
जय हिन्द
सिकेन शेखर बाजपेयी

No comments:
Post a Comment